ज्ञानपुर। केंद्र में मोदी की सरकार बनने के बाद थोक के भाव खोले गए जन-धन खातों के संचालन को लेकर खाताधारकों की निष्क्रियता बैंकर्स का सिरदर्द बढ़ाने लगी है। जिले में जन-धन के 21 हजार खातों में एक रुपया भी जमा नहीं है। 15-15 लाख रुपये की लालच में खोले गए खातों में सरकार की तरफ से कुछ नहीं मिला तो खाताधारकों ने भी एक भी रुपये जमा नहीं किये। अब बैंक अधिकारी इन खातों के संचालन को लेकर असमंजस में हैं।
सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के हर नागरिक के पास अपना खाता होने पर काफी जोर दिया था। उनकी इस मंशा को पूरा करने के लिए बैंकों ने अभियान चलाकर 2014-15 में दो लाख 43 हजार 697 खाते खुलवाए। शुरुआत में इन जन-धन खातों को खोलने में लोगों ने काफी दिलचस्पी दिखाई। अब यह खाते सिर्फ आंकड़ों तक ही सिमट कर रह गए हैं। तीन से चार साल तक लेन-देन न होने की वजह से 21 हजार खातों में जीरो बैलेंस होने के कारण वह निष्क्रिय हो गए।
बैंक अधिकारियों की मानें तो इन खातों में अतिशीघ्र लेन-देन होना बहुत जरूरी है, जिससे अटल पेंशन योजना समेत अन्य योजनाओं का लाभ लाभार्थियों को मिल सके। खातों के निष्क्रिय होने से एक तरफ़ जहां बैंकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है, वहीं जिस सोच के तहत सरकार ने इस योजना की शुरुआत की थी, वह भी जमीन पर नहीं उतर सकी। सभी खाते शून्य बैलेंस पर खोले गए थे। बाद में कई खाताधारियों ने अपने खाते में एक पैसे का भी योगदान नहीं किया, हालांकि दो लाख 22 हजार खातों में करीब 33 करोड़ की रकम अब भी है।
एलडीएम उमेश कुमार ने बताया कि सरकार की ओर से जब जन-धन योजना की शुरुआत की गई तो कई लोगों ने शून्य बैलेंस पर खाता तो खोलवा लिया, लेकिन खाता खोलवाने के बाद उसमें धनराशि जमा नहीं की। जिन लोगों के खाते में जमा निकासी की गई, उनको 10 हजार रुपये ओवर ड्राफ्ट की सुविधा भी दी गई। इसी खाते के माध्यम से जीवन ज्योति और अटल सुरक्षा योजना के तहत लोगों का दो लाख का बीमा करना था। खाताधारकों की ओर से लेन-देन न होने से काफी समस्याएं आ रही हैं।
जन-धन खातों में लेन-देन न होने से परेशान बैंकर्स को समझ में नहीं आ रहा है कि क्या किए जाए। ऊपर से दिशानिर्देश लेने के साथ ही खाताधारकों को नोटिस जारी कर खातों में लेन-देन करने के लिए कहा जा रहा है। माना जा रहा है कि सरकार ने लेन-देन की व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए सभी का खाता खुलवाने की जरूरत पर बल दिया था, लेकिन खाताधारकों के संजीदगी न बरतने से मुश्किलें बढ़ चलीं हैं।