ज्ञानपुर (भदोही)।
धान के सीजन में मानसून से धोखा खा चुके किसानों को आगे भी उम्मीद की किरण नजर नहीं आ रही है। ठंड के सीजन में 35 से 37 पर टिके मानसून ने विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। इससे आलू, मटर, चना और सरसों की खेती भी प्रभावित होना तय माना जा रहा है। मौसम में बदलाव न हुआ तो बीज भी 50 से 60 फीसदी ही अंकुरित होगा।
कृषि प्रधान देश भारत में 80 फीसदी से अधिक खेतीबारी मानसून पर भी निर्भर रहती है। 2015 में सूखे का संकट सहने वाले किसानों को 2016 में बेहतर सहयोग दिया। इससे धान और गेहूं की बंपर पैदावार हुई। 2017 में एक बार फिर धान के सीजन में बारिश ने धोखा दिया। सामान्य से करीब 50 फीसदी कम बारिश होने से धरती की तासीर भी ठंडी नहीं हो सकी। सितंबर महीने के बाद अक्टूबर में मौसम ठंडा होने लगता है लेकिन माह का अंतिम सप्ताह शुरू हो गया है और अधिकतम तापमान 35 से 37 और न्यूनतम 25 पर टिका हुआ है। तमाम मुश्किलें सहने के बाद किसान आलू, चना, मटर और सरसों की बुआई शुरू कर दिया है लेकिन मौसम की बेरुखी फसलों की लिए समस्या उत्पन्न करता दिख रहा है। इलाहाबाद कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डॉ. शिशिर त्रिवेदी ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते ऐसी स्थित उत्पन्न हो रही है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से मानसून में बदलाव दिख रहा है। फसलों पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। कृषि विज्ञान केंद्र बेजवां के कृषि वैज्ञानिक डॉ. राकेश पांडेय ने भी मानसून को लेकर चिंता जताई। कहा कि फसलों के लिए यह मानसून ठीक नहीं है।