ज्ञानपुर। जागरूकता और प्रचार-प्रसार के अभाव में रेलवे का फर्स्ट ऐड बाक्स यात्रियों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं। प्रति माह हजारों रुपये खर्च कर मंडलीय अस्पतालों की दवाओं से स्टेशनों के फर्स्ट ऐड बॉक्स भर तो दिए जाते हैं, लेकिन उनकी ज्यादातर दवाएं और मरहम अगले माह की पहली तारीख तक जस के तस पड़े रह जाते हैं। ज्यादातर यात्रियों को इसकी जानकारी ही नहीं है। ना ही विभाग की ओर से इसके प्रचार-प्रसार के लिए कारगर पहल की गई।
पूर्वोत्तर रेलवे के मंडुआडीह-इलाहाबाद सिटी रेलखंड के स्टेशनों पर प्राथमिक उपचार की व्यवस्था दो दशक से चली आ रही है। इसके लिए स्टेशनों पर फर्स्ट ऐड बॉक्स लगाए गए हैं। लेकिन, इनका लाभ गिनती के यात्री ही ले पाए होंगे। हर महीने बॉक्स में दवाएं भर दी जाती हैं, लेकिन ज्यादातर दवाओं का इस्तेमाल न होनेसे अगले महीने वह वैसे ही निकाल ली जाती हैं। रेलवे एक्ट के अंतर्गत इन दवाओं को यात्रियों को स्टेशन पर मौजूद रहने और टिकट लेने के बाद जब तक वह ट्रेन में बैठ नहीं जाते, तब तक यात्री के बेहोश होने, चोट लगने, बुखार आने, मरहम-पट्टी आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन, ज्यादातर यात्री इस व्यवस्था से परिचित ही नहीं हैं। समय-समय पर होने वाले निरीक्षणों में अधिकारियों की टीम फर्स्ट ऐड बाक्स को ही प्रथम वरीयता देती है। बावजूद इसके बॉक्स का सदुपयोग न कराया जाना विभाग की कार्यप्रणाली पर कई तरह के सवाल खड़े कर रहा है।
मंडल प्रशासन के पास नहीं है आंकड़ा
ज्ञानपुर। इस बाबत जब मंडल वाराणसी के पीआरओ अशोक कुमार से जानकारी मांगी गई तो उन्होंने इस संबंध में आंकड़े दे पाने में असमर्थता जताई। उन्होंने स्वीकार किया कि रेलखंड के सभी छोटे-बड़े स्टेशनों पर फर्स्ट ऐड बॉक्स की व्यवस्था दो दशक से चली आ रही है, लेकिन कितने लोगों को लाभान्वित कराया गया, इसका आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।