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ओडीएफ का सच अभियान

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औराई। औराई ब्लॉक के गांवों में ओडीएफ योजना का मखौल उड़ाया जा रहा है। कागज पर शौचालयों का निर्माण कराकर सरकारी धन की बंदरबांट देखनी हो तो यहां आइए। ज्यादातर शौचालय केवल नाम के इज्जतघर हैं। कहीं छत नहीं है तो कहीं कमोड ही गायब है। कई शौचालय अनुपयोगी होने के कारण झाड़-झंखाड़ में गुम हो रहे हैं।
अमर उजाला ने सोमवार को औराई ब्लॉक के गांवों में बनाए गए शौचालयों की पड़ताल की। इस दौरान मोदी सरकार के स्वच्छता मिशन को पलीता लगाने की स्याह हकीकत सामने आई। नमामि गंगे योजना के तहत चयनित कठारी गांव को काफी पहले ओडीएफ घोषित कर दिया गया था। पांच हजार के आसपास आबादी वाले इस गांव में 710 शौचालय बनवाए गए हैं। लेकिन, हकीकत यह है कि 90 फीसदी से अधिक शौचालय मुकम्मल नहीं हैं। किसी शौचालय में दरवाजा नहीं है तो कहीं छत ही नहीं है। कहीं बस्ती से अलग शौचालय बनवाकर कोरम पूरा कर लिया गया है। लंबे समय से अनुपयोगी होने से वह झाड़ियों में गुम हो रहा है।
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गंगा किनारे बसे इस गांव की विश्वकर्मा और यादव बस्ती में शौचालयों का अभाव है। ग्राम प्रधान गुलाम ने बताया कि लोगों से शौचालय साफ सुथरा रखकर उपयोग करने के लिए कहा जाता है। ग्रामसभा जेठूपुर की आबादी 2300 है। यहां 300 शौचालय बनवाए गए हैं। हालांकि इनमें ज्यादातर शौचालय उपयोग में लिए जाने की बात ग्रामीणों ने कही। गांव की वनवासी बस्ती में शौचालय बने देखे गए। ग्राम प्रधान गीता देवी ने बताया कि 150 आवास और उतने ही शौचालय और मिल जाए तो वनवासियों के साथ ही गरीब जनता भी संतृप्त हो जाएगी। इसके लिए प्रयास किए जा रहे हैं। कमोबेस यही हालत पुरुषोत्तमपुर गांव का भी रहा। लेकिन, यहां भी शौचालय के मोर्चे पर बहुत कुछ किया जाना बाकी है। गांव की आबादी 2500 और 383 शौचालय में से 35 बनने शेष रह गए हैं। ग्राम प्रधान अवधेश उपाध्याय ने बताया कि वे भी जल्द पूर्ण हो जाएंगे। लगभग 2200 आबादी वाले बारीगांव में भी अब तक 50 लोगों को शौचालय नहीं मिल सका है। ग्राम प्रधान जयदेवी ने बताया कि 205 शौचालय मिले थे, जिनमें से सभी बने हैं। 50 का काम अधूरा है। नमामि गंगे योजना के तहत चयनित बिट्ठलपुर गांव की आबादी 2000 है। यहां 1000 मतदाता हैं। गांव में 235 शौचालय बनाने का दावा किया गया है।
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जागरूकता मुहिम बेअसर, नहीं दिखती निगरानी टीम
औराई। सरकार के लाख कोशिशों और सुविधा देने के बाद भी उसके खुले में शौचमुक्त अभियान पर ग्रहण लगता दिखाई दे रहा है। 12 हजार की प्रोत्साहन राशि में बनाए गए शौचालय महज शोपीस बनकर रह गए हैं। ज्यादातर शौचालय उपयोग नहीं हो रहे हैं, जहां कहीं शौचालय पूर्ण भी हुए तो ज्यादातर ग्रामीण शौचालय का इस्तेमाल करने की बजाए बाहर ही शौच करना पसंद करते ैं। सीटी बजाने वाली निगरानी टीम का भी अता-पता नहीं है। सुबह-शाम सिवान में खुले में शौच करने वालों को टोककर जागरूकता फैलाने की मुहिम भी ठंडी पड़ गई है।
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