औराई। सुबह छह बजे: स्थान: सहसेपुर गांव। 42 साल के बाद जैसे ही मुरलीधर दूबे अपनों के बीच पहुंचे तो बुजुर्ग मां बसंती देवी फफक कर रो पड़ी। घर वालों ने किसी तरह उन्हें संभाला। उसके बाद परिवार के सदस्यों में कोई गले मिला तो किसी ने पैर छूकर आशीर्वाद लिया। चार दशक के बाद अपनों के बीच पहुंचे मुरलीधर भी खुद को संभाल नहीं सके और फूट-फूटकर रोने लगे। यह नजारा देखकर वहां मौजूद लोगों की आंखें नम हो गई।
औराई थानाक्षेत्र के सहसेपुर गांव निवासी मुरलीधर दुबे पुत्र सदानंद दुबे हाईस्कूल की परीक्षा में फेल होने के बाद पिता की डांट की डर से 42 वर्ष पूर्व 1976 में घर छोड़कर चले गए थे। उस समय उनकी उम्र 15 वर्ष थी। घरवालों ने काफी खोजबीन की, लेकिन उनका कुछ पता नहीं चला। कुछ दिन पूर्व राजस्थान के कोटेे में एक सड़क के किनारे मिले थे। वहां लावारिस लोगों की सेवा करने वाली संस्था ‘अपना घर आश्रम’ एअरोड्रम चौराहा कोटा राजस्थान के सरंक्षण में रह रहे थे।
इनके भाई शेषधर दुबे को सूचना देकर पुलिस ने परिजनों को कोटा भेजा। शुक्रवार को कोटा से रवाना हुए उनके भाई शेषधर दूबे शनिवार को सुबह घर पहुंच गए। चौरी-चौरी एक्सप्रेस से माधोसिंह स्टेशन पर पहुंचने के बाद सभी घर गए। चार दशक के बाद बेटे को देख बुजुर्ग मां बसंती देवी संग घर के अन्य सदस्यों के आंखो से आंसू बह निकले। मुरलीधर ने मीडिया से बताया कि हर बाप अपने बेटे की अच्छाई के लिये डाट फटकार लगाता है लेकिन बचपन का जनून मुझे दूर लेकर चला गया। करीब दस साल तक दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि शहरों में टहला और उसके बाद कोटा में आकर कबाड़ का काम शुरू किया। कुछ दिन कपड़ा बेचने का काम किया। मैं खुद को अपनों के बीच पाकर खुश हूं। पिता जी तो नहीं है लेकिन माता जी हैं उनकी सेवा करूंगा। सबसे खास बात रही कि चार दशक तक गांव से दूर रहे मुरलीधर गांव के हर सख्स को पहचान ले रहे थे।