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सोने की खोज: सपनों पर एतबार, विज्ञान दरकिनार

Sat, 19 Oct 2013 01:00 AM IST
अमर उजाला, कानुपर
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उन्नाव के डौंडिया खेड़ा में 1000 टन सोने के खजाने की खोज के वैज्ञानिक तरीके पर सपने और चमत्कार हावी हो गए हैं।
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विज्ञान में यकीन रखने वाले कहते हैं कि जिस तरह से राव रामबक्श सिंह के किले के तिलिस्मी खजाने को निकालने का काम शुरू हुआ है उससे लोग या तो चमत्कार का लोहा मानेंगे या फिर नीति नियंताओं पर सवाल उठाएंगे।

देश में भूगर्भ विज्ञान के इतना विकसित होने के बाद भी इसके विशेषज्ञों को पूरी गहराई तक पड़ताल का मौका दिए बिना आनन-फानन में खुदाई शुरू करा दी गई है। खुदाई का निर्णय जल्दीबाजी में लेने से हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
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तस्वीरों में देखिए: सोने के खजाने की तलाश

भूगर्भ विज्ञानी रिटायर्ड प्रोफेसर एके गुप्ता के मुताबिक किसी जगह खजाना या अन्य किसी धातु की संभावना तलाशने की एक लंबी प्रक्रिया है। सबसे पहले अंडरग्राउंड मेटल डिटेक्टर या गोल्ड मेटल डिटेक्टर की सहायता से पता लगाया जाता है कि जमीन के भीतर किस तरह की एनामली (असंगति) मिल रही है।

इसके बाद भूगर्भवेत्ता वहां की भूआकृति (मार्फोलॉजी) का अध्ययन करते हैं। इसके बाद जियोफिजिकल इंस्टूमेंट, इलेक्ट्रिकल सर्वे, मैग्नेटिकल सर्वे, टूडी-थ्री डी टेस्ट रेजिस्टिविटी के जरिए मिले संकेतों की एक्स-रे एनलिसिस, केमिकल एनलिसिस होती है।

पढ़ें:- गहराता जा रहा है किले का रहस्य और सोने का रोमांच

इसके अलावा भी कई अन्य वैज्ञानिक तरीकों से विश्लेषण करने के बाद ड्रिलिंग कर अंदर की स्थिति जानी जाती है। इसके पहले सेटेलाइट इमेज के जरिए मेटल किस जोन में हैं इसकी लोकेशन का पता किया जाता है।

सवाल यह है कि इस समूचे प्रकरण में क्या आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (एएसआई) और जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) के उच्चाधिकारियों ने साझा योजना बनाकर खुदाई की काम शुरू कराया है या सिर्फ एएसआई ने अपने निष्कर्षों के आधार पर खुदाई का निर्णय लिया है। यह बताने वाला कोई नहीं है।

पढ़ें:- मोदी गरजे, खुदाई ने कराई जगहंसाई

अगर जीएसआई के संकेतों पर एएसआई ने उत्खनन शुरू किया है तो वहां हेवी मेटल मिलने चाहिए, अगर ऐसा नहीं है तो ये माना जाएगा कि जिस चीज को वैज्ञानिक तरीके अपनाकर एक सटीक प्रक्रिया अपनाई जा सकती थी वहां अवैज्ञानिक तरीके अपनाकर एक निरर्थक तमाशा खड़ा किया गया जो विश्वासों, अटकलों, ज्योतिषीय भविष्यवाणियों पर ज्यादा आधारित था। उसे आधार मानकर मुंगेरी लाल के हसीन सपने संजोए जाने लगे।

सरकार को रिपोर्ट भेज दी गई है: जीएसआई
जीएसआई के लखनऊ स्थित आफिस के पॉलिसी सपोर्ट सिस्टम डायरेक्टर सिद्धार्थस्वरूप ने कहा कि हमने रिपोर्ट सरकार को भेज दी है। अभी हम कुछ नहीं बोलेंगे। वहां से कुछ नतीजे मिलने के बाद ही हम कुछ कह पाएंगे। लखनऊ स्थित ही रिमोट सेंसिंग अप्लिकेशन सेंटर केडाइरेक्टर पीएन शाह का कहना है कि हमसे डौड़ियाखेड़ा प्रकरण में कोई मदद नहीं ली गई।

वीएलएफ टेक्नोलॉजी से पता लगाना आसान
विश्व के कई विकसित देश जमीन के भीतर छिपी संपदा, धातु, (सोना, चांदी, तांबा आदि) वीएलएफ टेक्नोलॉजी के जरिए रेजोनेंट, फ्रीक्वेंसी नोबल मेटल्स एंड ट्रेजर रिसीवर्स के जरिए सटीक पता लगा रहे हैं। ये उपकरण लोकल ए.एम. रेडियो स्टेशन के जरिए जमीन और हवा दोनों में सिगनल ट्रांसमिट करते हैं।
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ये तरंगें जमीन के अंदर स्थित टार्गेट से टकराती हैं और उपकरण केट्रेजर चेस्ट में दिखाई पड़ती हैं। जमीन के भीतर एक बार इन तरंगों से टकराने के बाद वीएलएफ रिसीवर्स उस वस्तु के चारों ओर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड बनाता है और खास मेटल से टकराकर एक अनुगूंज पैदा करता है। वीएलएफ मशीन का रिसीवर एक खास नंबर से ट्यून होता है। यह ट्यून गणितीय गणना (मैथमेटिकल कैलकुलेशन) पर आधारित है। इसे एएम स्टेशन ट्रांसमिशन फ्रीक्वेंसी पर सेट किया जाता है।
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