‘आत्मनिर्भरता से ही बढ़ेगी सामाजिक सुरक्षा’
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
बस्ती। महिलाओं ने सभी क्षेत्र में पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर कदम बढ़ाया। नतीजा यह रहा है कि वे सभी क्षेत्र में अपना लोहा मनवा रही हैं। शिक्षा से लेकर व्यवसाय और धरती से लेकर आसमान तक के कदम चूमने को लेकर महिलाओं का जज्बा खूब फल फूल रहा है। कई ने तो जीवन की विषम परिस्थितियों से दो-दो हाथ करने के बाद मिसाल कायम कर ली।
संवाददाता ने सोमवार को कुछ ऐसी ही महिलाओं से बातचीत की जिन्होंने विषम परिस्थितियों में खुद को मजबूत किया और परिवार का संबल बन गईं। इनका मानना है कि आत्मनिर्भरता से ही महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा बढ़ सकेगी।
आसमान चूमना ही लक्ष्य
शहर के गांधी नगर निवासी राकेश श्रीवास्तव व सुनीता की बेटी अनुश्री इन दिनों यूनाइटेड किंगडम यानी इंग्लैड के कालचेस्टर सिटी में रह कर माइक्रो आइट्रोलॉजी अर्थात स्पेस विषय से पीएचडी कर रही हैं। यहां नासा ने उन्हें भेजा है। बस्ती की बेटी अनुश्री के कदम अंतरिक्ष की ओर बढ़ चले हैं, जिसे लेकर वे भी पूरी तरह आश्वस्त हैं। अक्तूबर में अनुश्री पीएचडी पूरी कर नासा चली जाएंगी। बताती हैं कि वे यहां वे अंतरिक्ष अभियान का हिस्सा बन जाएंगी।
परिवार का संबल बन गईं आशा
जिले के कुदरहा ब्लॉक के ग्राम चकिया गांव निवासी आशा चौधरी के पति की मौत 13 वर्ष पहले हुई थी। परिवार में कोई पुरुष सदस्य नहीं है। ऐसे में आशा ने घर की दहलीज लांघ कर पहले खेती संभाली, फिर कदम दर कदम बढ़ाते हुए ननदों की शादी कर दी। बच्चों की देखरेख के अलावा आशा अपनी एक ननद को आईएएस की तैयारी के लिए इलाहाबाद भेज दिया। आशा को क्षेत्र के लोग बेहद सम्मान की नजर से देखते हैं। परिवार के लिए संबल बनकर हर मुसीबत से निपट रही हैं।
संघर्ष से परिवार को दिया मुकाम
शहर के गांधी नगर की निवासी पदमा बरनवाल यूं तो घरेलू महिला थीं, मगर परिस्थितियों ने उन्हें एक सशक्त नारी बना दिया। दवा व्यवसायी पति अरविंद बरनवाल की अचानक 2007 में मौत हो गई। परिस्थिति बिगड़ी, मगर पदमा ने हौसला बनाए रखा और अपने कंधे पर परिवार का बोझ उठा लिया। हार मानने के बजाय संघर्ष विकल्प चुना तो रास्ते खुल गए। पति का कारोबार संभाल लिया और फिर बेटी को चार्टड अकाउंटेंट बनने की अभिलाषा पूरी की। जबकि बेटे को अपने साथ रखकर उसे कारोबार में उतार दिया है।
बेटे को बनाया कमांडेंट व बेटी समीक्षा अधिकारी
कुदरहा ब्लॉक के डेल्हवा गांव निवासी निजी स्कूल में शिक्षक नीलम द्विवेदी महिलाओं के लिए उदाहरण हैं। पति नरेंद्र द्विवेदी के साथ स्कूल से मिले समय में आटा चक्की चलाती हैं। अपने मेहनत के बलबूते बेटे व बेटी को उच्च शिक्षा दिलाई। बेटे अनुराग ने कई प्रतियोगी परीक्षाओं में अपनी प्रतिभा के बल पर सफलता हासिल की, मगर इन दिनों व सीआरपीएफ में कमांडेंट पद पर तैनात हैं, जबकि बेटी निहारिका भी किसी से कम नहीं हैं। उसने पीसीएस परीक्षा में स्थान हासिल कर सचिवालय में समीक्षा अधिकारी का पद हासिल किया है। नीलम बताती हैं कि हौसलों के बल पर उसने परिवार को संबल दिया। शिक्षा का ही परिणाम है कि बेटा व बेटी अच्छे पद पर पहुंच गए हैं।