संवाद न्यूज एजेंसी
मुंडेरवा। आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी रविवार को महिलाओं ने श्रद्धा और आस्था के साथ जिउतिया माता का व्रत रखा। दिनभर निर्जल रहकर महिलाएं शाम को पूजा-अर्चना कर पुत्रों की सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना कीं।
लोकमान्यता के अनुसार, जिउतिया या जीवित्पुत्रिका व्रत में भगवान जीमूतवाहन की पूजा की जाती है। धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में वर्णन है कि जीमूतवाहन ने एक माता के पुत्र की जान गरुड़ से बचाई थी। तभी से यह व्रत संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए माताओं द्वारा किया जाने लगा। व्रत की विशेषता यह है कि महिलाएं कच्चे धागे या रेशमी धागे से सात गांठों वाली माला तैयार करती हैं। पहले इसे अपने पुत्र को पहनाती हैं और फिर देर शाम स्वयं अपने गले में धारण कर लेती हैं। यह माला अगले जिउतिया पर्व तक महिलाएं पहनकर रखती हैं।
क्षेत्र की महिलाएं इस व्रत को लेकर बेहद उत्साहित रहीं। दिनभर उपवास रखने के बाद महिलाएं शाम को नदी, तालाब अथवा घर के आंगन में स्नान कर पूजा-पाठ करती हैं। इसके बाद कथा वाचन कर भगवान जीमूतवाहन की स्तुति की जाती है। महिलाओं ने बताया कि यह व्रत संतान की लंबी उम्र के लिए अनिवार्य माना जाता है।
ग्राम की सावित्री देवी, गीता पांडेय और नीलम सिंह ने कहा कि जिउतिया व्रत मातृत्व और पुत्र मोह से जुड़ा है। जब तक सांस चलेगी, वे इस व्रत को निभाती रहेंगी। वहीं, कुसुम वर्मा ने कहा कि यह व्रत सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि माताओं की आस्था का प्रतीक है।
पूरे दिन गांव और कस्बों में धार्मिक माहौल बना रहा। महिलाओं के निर्जल उपवास और शाम को किए गए पूजन-पाठ से वातावरण भक्ति और आस्था से सराबोर हो गया। पुरुषों और बच्चों ने भी व्रती महिलाओं का सहयोग किया। जिउतिया माता व्रत के अवसर पर पूरे क्षेत्र में परंपरा और आस्था का अद्भुत संगम देखने को मिला।