बस्ती। मान्यता विहीन स्कूलों को बंद कराने की मुहिम से बच्चों का भविष्य संकट में पड़ गया है। जनपद के गैर मान्यता प्राप्त कुल 338 स्कूल बंद कराने के लिए चिह्नित किए जा चुके हैं। इनमें से 106 स्कूल बंद भी करा दिए गए। अब इन स्कूलों के बच्चों की पढ़ाई लगभग ठप हो गई है। अभिभावक मझधार में हैं।
नए सत्र में अच्छी खासी रकम खर्च कर बच्चों को दाखिला दिलाए और जब पढ़ाई की बारी आई तो विद्यालय ही बंद। सवाल है कि कार्रवाई की जद में आए स्कूलों के बच्चों को लेकर अभिभावक कहां जाएं? सरकारी विद्यालयों के शैक्षिक गुणवत्ता पर सवालिया निशान पहले से ही है। यहां कोई भी अभिभावक अपने बच्चों के दाखिला कराने को राजी नहीं है। दूसरे स्कूल में ले जाए तो फिर खर्च का बोझ। ऐसे में चौतरफा मुसीबत अभिभावकों की हो गई है।
लोगों का कहना है कि बिना मान्यता के स्कूलों पर तालाबंदी की कार्रवाई भले ही नियमों के अनुकूल है लेकिन इसकी मार बच्चों और अभिभावकों पर पड़ रही है। इसका निदान न तो विभाग के पास है और न ही प्रशासन कोई इंतजाम कर पा रहा है। अभिभावकों का तर्क यह कि बिना मान्यता के स्कूल संचालित होने में न तो बच्चों की भूमिका है और न ही अभिभावकों का कोई दोष है। इन विद्यालयों को बंद कराने से यहां अध्ययनरत बच्चों के लिए कोई ठोस विकल्प तैयार होना चाहिए। विभाग परिषदीय विद्यालयों में दाखिला कराने की सलाह देकर फुर्सत पा ले रहा है। असलियत में वहां गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई का माहौल ही नहीं है। यदि ऐसा होता तो अधिकांश बच्चों का दाखिला निजी स्कूल में कराने की नौबत ही नहीं आती। इधर, नए सत्र के लिए बच्चों का फीस संबंधित स्कूलों में जमा हो चुका है और कापी, किताब, बैग एवं ड्रेस भी आ चुके हैं। प्राइमरी स्तर की पढ़ाई में प्रत्येक स्कूल में अलग-अलग पुस्तकें हैं। ऐसे में दोबारा किसी दूसरे स्कूल में इन बच्चों का दाखिला कराने में किताब, ड्रेस के अलावा फीस के खर्च का बोझ अभिभावकों पर बढ़ना स्वाभाविक है।
अंग्रेजी माध्यम के प्रतिष्ठित विद्यालयों में पढ़ाई सबसे महंगी
जिले में मान्यता के साथ संचालित होने वाले अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में बच्चों की पढ़ाई सबसे महंगी है। यहां प्रवेश पाना और खर्च उठाना दोनों कठिन है। बिना मान्यता वाले स्कूल अभिभावकों की क्षमता के अनुसार बच्चों को पढ़ाने को राजी हो जाते रहे। अब समस्या तो जटिल हो ही गई है। यह एक तरह से बिना मान्यता के स्कूल संचालित करने वाले प्रबंधकों का छल है। अब या तो बच्चों के नए एडमिशन का भार उन्हीं पर थोपा जाए या प्रशासन मान्यता प्राप्त स्कूलों को इन बच्चों के दाखिले को पूरी सहूलियत बरतने का निर्देश जारी करे। -चंद्रिका सिंह, जिलाध्यक्ष, उत्तर प्रदेशीय प्राथमिक शिक्षक संघ
कोविड काल में आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण लोगों ने अपने बच्चों का प्रवेश सरकारी या निजी स्कूलों में करा दिया। घर से नजदीक होने से अभिभावक अपने बच्चों बिना मान्यता प्राप्त स्कूलों में दाखि़ला करा देते हैं, लेकिन जब बच्चों को टीसी देने की बात होती है तो नहीं मिल पाली है। ऐसे में अभिभावकों को भी इसके प्रति जागरूक होना चाहिए। -महिमा पांडेय, प्रधानाचार्य निजी स्कूल
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अपने बेटे का प्रवेश क्षेत्र के स्कूल में कराया था। दाखि़ले के समय उन्हें बताया गया था कि स्कूल मान्यता प्राप्त है, लेकिन बाद में पता चला कि स्कूल को मान्यता नहीं मिली है। अब विभाग स्कूल को बंद करा दिया। बेटे के लिए किताब-कापी खरीद दी और फीस भी जमा कर दी। अब इतना पैसा नहीं है कि दूसरे स्कूल में दाखिला करा सकूं। -सुखमंगल सिंह, अभिभावक
विभाग बिना मान्यता वाले स्कूल पर कार्रवाई कर रहा है। कई सालों से ये विद्यालय संचालित हो रहे थे। पहले ही बंद करा दिया होता तो आज बच्चों का भविष्य अंधकार मय नहीं होता है। अभिभावक असमंजस में हैं। बच्चों का प्रवेश कहां कराएं। सरकारी स्कूल में न शिक्षक हैं न सुविधा। -रत्नेेश कुमार, अभिभावक