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भिक्षाटन कर शिक्षकों ने विरोध जताया

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प्रद्रशर्शनप करते शिक्षक। - फोटो : amar ujala
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अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। मानदेय और सेवा सुरक्षा सहित विभिन्न मांगों को लेकर वित्तविहीन शिक्षक संगठन मूल्यांकन के आठवें दिन भी कार्य बहिष्कार पर रहे। आक्रोशित शिक्षकों ने रविवार को भिक्षाटन कर विरोध जताया। क्रमिक अनशन और मूल्यांकन बहिष्कार के साथ नेताओं का प्रतिनिधि मंडल चारों मूल्यांकन केंद्रों का भ्रमण कर स्थिति का जायजा लिया।
वित्तविहीन गुट के जिलाध्यक्ष प्रभु नाथ पांडेय, महामंत्री रजवंत यादव, अर्जुन यादव, माध्यमिक शिक्षक महासभा के प्रदेश मंत्री रमेशकर पाठक, अनिल तिवारी, जिला उपाध्यक्ष प्रतिमा चौधरी, प्रकाश मोहन श्रीवास्तव, विकास चंद पांडेय, बागी गुट के जिलाध्यक्ष इंद्रसेन चौधरी, राम सरन चौधरी, रमजान अली, सफी मोहम्मद की अगुवाई में शिक्षकों ने जीआईसी व जीजीआईसी के अलावा श्रीकृष्ण पांडेय इंटर कॉलेज, सक्सेरिया इंटर कॉलेज के गेट पर प्रदर्शन किया। उसके बाद कमरों में पहुंचकर मूल्यांकन बहिष्कार का आह्वान किया। आंदोलनकारियों ने मूल्यांकन कार्य का बहिष्कार करो, मानदेय की राजाज्ञा जारी करो, जब तक शिक्षक भूखा है ज्ञान का सागर सूखा है, जीना है तो मरना सीखो कदम कदम पर लड़ना सीखो सहित तमाम नारे लगाए। इस मौके पर विजय यादव, प्रदीप पांडेय, राजेंद्र प्रताप सिंह, हरी राम यादव, मानवेंद्र, विपिन कुमार त्रिपाठी, काली शंकर गुप्ता, अखिलेश कुमार त्रिपाठी, केदारनाथ शुक्ला, चंद्र प्रकाश त्रिपाठी, राकेश कुमार पाठक, कृपा शंकर तिवारी, आलोक कुमार तिवारी, यशवंत श्रीवास्तव सहित तमाम शिक्षक मौजूद रहे द्य
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वित्तविहीन शिक्षक आंदोलन 
...लोहा गरम देखकर मारा हथौड़ा
आसान दिखा मूल्यांकन के दौरा ताकत का प्रदर्शन 
वीरेंद्र पांडेय
बस्ती। 
लोहा गरम देखकर हथौड़ा मारने की पारंपरिक कहावत इन दिनों वित्तविहीन शिक्षकों पर सटीक बैठती है। मूल्यांकन का बहिष्कार करके बोर्ड की चूलें हिला देने वाले जिले के आठ हजार से ज्यादा शिक्षकों की खोज खबर अगर पहले ली गई होती तो राजकीय इंटर कॉलेज मूल्यांकन केंद्र पर भौतिक विज्ञान की कापियों का बंडल यूं ही धूल न फांक रहा होता। न ही जीजीआईसी केंद्र पर इंटरमीडिएट की अंग्रेजी और रसायन विज्ञान विषय की उत्तर पुस्तिकाओं के लिए परीक्षकों का अकाल पड़ा होता। न ही दुनिया का सबसे बड़ा शैक्षिक बोर्ड घुटने टेकने पर मजबूर न होता।  हकीकत यह है कि जिले के 20 जीआईसी-जीजीआईसी और 70 वित्तपोषित को लेकर कुल 379 माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में ज्यादातर विज्ञान, अंग्रेजी और गणित जैसी महत्वपूर्ण विषयों का अध्यापन इन्हीं वित्तविहीन शिक्षकों पर है। लेकिन इन्हें मामूली भुगतान ही नसीब होता है। जबकि दूसरी कम माथापच्ची वाले विषयों के शिक्षक भी ज्यादा हैं और उनकी कॉपियों के परीक्षक भी पर्याप्त हैं।
 अब वित्तविहीन शिक्षकों का कहना है कि सारी भागदौड़ और दिमाग का कचूमर करने के बावजूद न तो सम्मान मिल रहा है न ही गृहस्थी चलाने भर का पैसा ही भुगतान हो रहा है। इसका अहसास दिलाए बिना उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा। हालांकि, उनके इस रुख से समय रहते मूल्यांकन पूरा होने में संदेह है लेकिन माध्यमिक शिक्षा में इनकी सबसे ज्यादा भागीदारी को नजरअंदाज किया जाना भी कम अहमियत का मुद्दा नहीं माना जा रहा है। 
निराकरण का प्रयास तेज
डीआईओएस डा. बृजभूषण मौर्य का कहना है कि बहिष्कार-आंदोलन की वजह से महत्वपूर्ण विषयों के परीक्षकों की उपलब्धता प्रभावित हुई है। इस समस्या के निराकरण का प्रयास किया जा रहा है। 

शिक्षक नेता बोले, इन्हीं की छिड़ी है लड़ाई
उप्र वित्तविहीन शिक्षक महासभा के प्रदेश मंत्री रमेशकर पाठक ने दबाव की दलील को नकारते हुए दावा किया कि वित्तविहीन शिक्षकों के भविष्य के लिए यह आंदोलन छेड़ा गया है। कहा कि अल्प मानदेय पर पढ़ाने और बेहतर रिजल्ट की जवाबदेही के बावजूद अगर मेहनताना मिलता तो मूल्यांकन के लिए परीक्षकों का अकाल न पड़ता।
क्या कहते हैं लोग 
 कपड़ा व्यापारी राजेंद्र शुक्ला का कहना है कि शिक्षा समाज का सबसे जरूरी अंग है। इस पर किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं की जानी चाहिए। शासन व प्रशासन दोनों इस ओर ध्यान दें। 
समाजसेवी रत्नाकर सिंह का कहना है कि शिक्षा पर किसी तरह की ढिलाई से समाज पिछड़ता है। इसलिए सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या पूरी रहनी चाहिए ताकि पठन-पाठन में परेशानी न होने पाए। 
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विद्यालय के प्रबंधक सुरेन्द्र दुबे का कहना है कि मानकविहीन विद्यालयों पर जिला प्रशासन अंकुश लगाए, तकि छात्रों का पठन-पाठन में ध्यान जाए। उन्हें शिक्षा के लिए परेशान न होना पड़े।
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