इमाम हुसैन और उनके साथी सातवीं मोहर्रम से कर्बला के तपते मैदान में भूखे और प्यासे थे। यजीदी फौज ने नहर के किनारे पहरा लगा इमाम के खेमों में पानी ले जाने पर पाबंदी लगा दी थी। भूख और प्यास के साथ तमाम मुसीबतें सहने के बाद भी इमाम ने यजीद के सामने सिर नहीं झुकाया। इमामबाड़ा शाबान मंजिल में आयोजित मजलिस को खिताब करते हुए मौलाना मोहम्मद हैदर ने ये बातें कहीं।
मौलाना ने कहा कि पैगंबर ने फरमाया था कि मेरा हुसैन मुझसे है और मै हुसैन से हूं। पैगंबर यह दुनिया को समझाना चाहते थे कि मेरा नवासा हुसैन मुझसे है लेकिन मेरा दीन हुसैन की कुर्बानी की बदौलत ही बाकी रहेगा। बताया कि इमाम हुसैन यजीद से जंग करने के लिए कर्बला नहीं आए थे। अगर वे जंग करने आते तो अपने साथ मदीने से जवानों की फौज लाते न कि छोटे बच्चों व औरतों के साथ आते। यजीदी फौज ने इमाम के लिए पानी बंद कर समझा था कि मजबूर होकर इमाम यजीद की बैय्यत कर लेंगे।
इमाम जानते थे कि अगर उन्होंने यजीद की बात मान ली तो उनके नाना का दीन हमेशा के लिए मिट जाएगा। दसवीं मोहर्रम को हमला कर इमाम और उनके साथियों को शहीद कर दिया गया। इमाम ने अपने आखिरी समय में अपने चाहने वालों से कहा था कि जब भी तुम ठंडा पानी पीना तो मेरी प्यास को याद कर लेना। इमाम दुनिया को यह पैगाम देना चाहते थे कि मेरे बाद अब दुनिया में कोई कुनबा भूखा-प्यासा शहीद न किया जाए। मजलिस में इमाम अली, हसनैन रिजवी, साजिद हसन, आसिफ हसन, एहसान अली, शम्स आबिद, फरहत हुसैन समेत कई अन्य लोग मौजूद रहे।