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Basti News: सिमट रहे ताल-तलैया, भुइला ताल भी प्यासा

Sat, 03 Feb 2024 02:09 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
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विश्व आर्द्रभूमि दिवस पर विशेष
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कब्जे के चलते सिमटती जा रही है आर्द्रभूमि, वजूद पर खतरा
ऐतिहासिक भुइला ताल के ज्यादातर हिस्सों पर हो चुका है कब्जा
समाप्त होने के कगार पर है शहर के प्रमुख तालों का अस्तित्व
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। परिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाने वाली आर्द्र भूमि (वेटलैंड) का वजूद सिमट रहा है। ताल, सिकुड़कर तलैया हो गए हैं। तलैया को पाटकर लोगों ने खेत व मकान बना लिए हैं। प्राचीन काल का भुइला ताल भी प्यासा है। बढ़ती जनसंख्या का दबाव आर्द्र भूमि को निगलता जा रहा है। बचे तालाब का वजूद भी खतरे में है।
नतीजा, जलीय वनस्पतियों व जीवों के वास स्थान खत्म हो रहे हैं। इसके बाद भी आर्द्र भूमि को बचाने के लिए ठोस पहल नहीं की जा रही है। कभी विदेशी पक्षियों से गुलजार रहने वाला चंदो ताल के अधिकतर हिस्से सूख चुके हैं। प्रवासी पक्षियों की आमद कम हो चुकी है। जलीय जीवों व वनस्पतियों का अस्तिव भी खतरे में है। किसानों ने खेतों का दायरा बढ़ाने के लिए वेड लैंड को सिकोड़ दिया है। ऐतिहासिक तालों के बड़े हिस्सों पर आज खेती की जा रही है। विश्व आर्द्र भूमि दिवस पर कुछ तालों का जायजा लिया गया तो हालात सामने आ गए। प्रस्तुत है
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गौर ब्लॉक के महुआडाबर ग्राम पंचायत में स्थित भुईला ताल के बारे में कहा जाता है कि सूखा पड़ने के बाद भी यह नहीं सूखता था। मगर, प्रशासनिक शिथिलता के कारण यह प्राचीन धरोहर अब अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। करीब 95 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैले इस ताल के अधिकतर हिस्सों पर लोगों ने कब्जाकर खेती करना शुरू कर दिया है। करीब एक दशक पहले तक यहां साइबेरियन पक्षियों को देखने लोग आते थे। 2019 में तत्कालीन विधायक सीए सीपी शुक्ल ने तालाब के सुंदरीकरण के लिए वन विभाग से कार्ययोजना भी तैयार कराया, लेकिन यह परवान नहीं चढ़ा पाया। इसी साल पुरातत्व विभाग की टीम ने टीले की खोदाई कराई थी, जिसमें मिलीं ईंट व बर्तन के टुकड़े छठी शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर 1250 इस्वी तक बताए गए थे। अब यह ताल करीब 150 बीघे में सिमट कर रह गया है। इसमें पानी भी न के बराबर है।
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शहर के पांडेय पोखरा व महदेव ताल पर हो चुका है निर्माण
शहर के तुरकहिया, महरीखांवा, लौकियहवा में स्थित पांडेय पोखरा को रमणीय स्थल के रूप में संवारा जा सकता था। मगर, अब यह पोखरा भू-माफिया के कब्जे में है। इस जलाशय के किनारों की जमीन हड़प ली गई है। डेढ़ दशक से यहां कब्जा करने का खेल चल रहा है। खतौनी से लेकर मौके तक भारी फेरबदल हुआ। यह जलाशय दिन-ब-दिन सिकुड़ता गया और इसके चारों तरफ काॅलोनी बस गई। यही हाल शहर के महदेव ताल, भुजैनी ताल, लैबुड़वा आदि तालों का है।
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अमृत सरोवरों में सूखा मिला अमृत
पंचायतों में अमृत सरोवर का निर्माण जोर शोर से कराया गया। करीब 43 अमृत सरोवरों को मौके पर जाकर देखा गया, लेकिन किसी में पानी नहीं मिला। सब सूखे पड़े हैं। उनके तटों पर हरियाली के लिए लगाए गए पौधे सूख चुके हैं।
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आर्द्र भूमि का संरक्षण जरूरी
शिवहर्ष किसान पीजी कॉलेज के वनस्पति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शिवेंद्र मोहन पांडेय बताते हैं कि आर्द्र भूमि हमारे परिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा हैं। यह कई तरह के जीवों व वनस्पतियों का घर हैं। इनके खत्म होने से परिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगड़ जाएगा। इस वजह से इनका संरक्षण जरूरी है।
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