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Basti News: शिद्दत से सजाई गई थी प्रतिमाएं... नाचते झूमते हुई विदाई, विसर्जन के बाद मची नोच- खसोट

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हरैया के मनोरमा तट पर मूर्ति विसर्जन के बाद फैला कचरा।
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- पूजा के बाद जलाशयों में विसर्जित की गई प्रतिमाएं, लूटे गए साज-सज्जा के सामान
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- प्रतिमाओं के गले में पहनाई गई रुपयों की माला नोचने के लिए टूट पड़े लोग, पानी में कूदे
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। बड़े शिद्दत से सजाईं गईं थीं दुर्गा पूजा समारोह के लिए देवी- देवताओं की प्रतिमाएं। मूर्तियों के लिए शृंगार में क्या- क्या नहीं किया गया। सुनहरे आभूषणों के साथ नए परिधानों से सभी प्रतिमाएं सजी धजी रहीं। गले में वैजयंती माला... साथ में सौ- पचास, पांच सौ के नए नोटों का हार भी सुशोभित था। देवी- देवताओं के सजीव चित्रण का अहसास कराती यह चमकदार मूर्तियां नौ दिनों की पूजा-अर्चना के बाद तालाब- पोखरों में मलबे के तरीके से ढेर कर दी गईं। नाचते- झूमते लोग इन मूर्तियों को जलाशयों के पास लेकर पहुंचे और विसर्जित करके चल दिए। इसके बाद नोच- खसोट मच गई। साज- सज्जा के सामानों की नोच- खसोट दिन भर चलती रही।
मूर्तियों से आभूषण, परिधान उतारने की होड़ मच गई। विसर्जन के बाद बच्चों के साथ जवान भी पानी में कूद पड़े। एक मूर्ति की ओर छलांग लगाकर अधिकार जताया गया। माटी पुतले पर उकेरे गए देवी- देवताओं की आकृति देखने के बाद भी आस्था रुकावट नहीं बनी। अलबत्ता मूर्तियों की पोशाक, आभूषण एवं शृंगार की अन्य चीजों को नोचने के लिए उन्हें खींचकर घाट के किनारे ले आया गया। मूर्तियों पर पड़ी साड़ी, गहने, रुपयों की माला एक- एक कर निकाल ली गई।
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इन्हें रोकने-टोकने वाला कोई नहीं था। मूर्तियों को नोचने- खसोटने को लेकर आपस में झड़प भी होती रही। कोई अवशेष सामग्रियों को बेचकर नकद करने की फिराक में था, तो कुछ घरों पर ले जाकर इस्तेमाल करने की जोर आजमाइश करते रहे। जिले के ग्रामीण अंचल में बुधवार तक लगातार मूर्तियों के विसर्जन के चलते घाटों पर बृहस्पतिवार तक यह दृश्य देखने को मिला।

गगरी बिक जाएगी, कपड़े काम में आएंगे
मूर्तियों के साथ कलश के रूप में विसर्जित की गई छोटी- बड़ी गगरी इकट्ठा करने की होड़ मची रही। सोनहा क्षेत्र के शिवाघाट पर विसर्जन के बाद 20 से 25 गगरी इकट्ठा करने वाले युवक दाऊ ने बताया कि यह बाजार में 15- 20 रुपये में बहुत आसानी से बिक जाएगी, जबकि सलमा ने बताया कि मूर्तियों से उतारी गई साड़ी एवं अन्य पोशाक घरेलू उपयोग में आ जाएंगे। यह कपड़े तकिया, गद्दे के खोल आदि बनाने में काम आएगा। शाहिदा के हाथ में शृंगार के सामान थे। उसने बताया कि मेले आदि जाने में वह इसका खुद उपयोग करेंगी।
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बक्सई, मनोरमा घाट पर अपशिष्टों की भरमार
वाल्टरगंज क्षेत्र के बक्सई घाट पर मूर्तियों का विसर्जन दो दिनों तक चला। यहां घाट पर अपशिष्टों को जहां- तहां बिखेर कर दिया गया। पूजा कमेटियां मूर्तियों के विसर्जन के बाद लौट गई। इसके बाद नोचने- खसोटने वाले पहुंचे तो जरूरत की सामग्रियों को साथ ले गए। बाकी अपशिष्ट घाट पर ही बिखेर दिए। कमोबेश यही हाल हर्रैया के मनावर नदी के विभिन्न घाटों पर भी देखने को मिला। नगर बाजार क्षेत्र, कुदरहा, लालगंज, रुधौली आदि क्षेत्रों की नदियों एवं सरोवरों के तट पर भी अपशिष्ट बिखरे पाए गए।

लकड़ियां तक ढो ले गए लोग
मूर्तियों को बनाने में इस्तेमाल हुई लकड़ियां या बांस की फट्टियों को भी लोग ढो ले गए। इनको निकालने के लिए मूर्तियों को पैरों तले रौंदा गया। जो भी मूर्ति जिसके हाथ में आई फिर दो- तीन के साथ उसे उधेड़ने उजाड़ने में जुट गए। मलबा घाट पर छोड़ दिया और जरूरत की लकड़ी उठा ले गए।
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बिंदिया, नथिया निकालने की होड़
विसर्जन के बाद घाटों पर मूर्तियों के माथे पर सजाई गई सुनहरे रंग की बिंदिया और नाक की नथिया निकालने की होड़ रही। इसके चक्कर में लोग एक दूसरे से जूझते नजर आए। वहीं रुपयों की माला निकालने के लिए भी लोग कोशिश करते रहे। कुआनों नदी के देवराव घाट पर दो बच्चे रुपये की माला नोचने को लेकर आपस में भिड़ गए। बाद में बड़े लोगों ने बीच-बचाव किया।

शास्त्रों में विसर्जन की यह है प्रक्रिया
शास्त्रीय विधि के अनुसार मूर्ति पंच महाभूतों से बनी होती है। इसीलिए इसे पंच महाभूतों में विलीन कर देना ही मूर्ति विसर्जन कहलाता है। प्रतिमा चाहे दुर्गा की हो या श्री गणेश की, उसे पानी में लाकर उतरते हैं। फिर धीरे- धीरे जल में अर्पित किया जाता है। विसर्जन के दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि मूर्ति खंडित न हो। विदाई में शामिल लोगों को पानी में डूबने से भी बचना होता है। इसीलिए गहरे पानी में नहीं जाना चाहिए।

आधा अधूरा ज्ञान ठीक नहीं
मूर्तियों के विसर्जन में आधा अधूरा ज्ञान ठीक नहीं है। स्थापना के बाद जिस आस्था के साथ मूर्तियों की पूजा होती है उससे भी ज्यादा श्रद्धा विसर्जन में होनी चाहिए। यह विदाई का वक्त होता है कोई भूल चूक नहीं होनी चाहिए। मगर गलत परंपरा पड़ गई है। लोग उछल कूद ज्यादा करते हैं विसर्जन विधि का पालन नहीं करते हैं।
-पं. सरोज मिश्र, संस्थापक, श्री शनैश्वर मंदिर।

शोरगुल, दिखावा के बजाय श्रद्धा से करें विसर्जन
माता की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा जब करते हैं तो माना जाता है कि प्रतिमा जीवित रूप में विराजमान है। हमें प्रतिमा का विसर्जन यानी कि माता की अंतिम विदाई विधिविधान से करनी चाहिए। जिस तरह से माता- पिता को अंतिम विदाई देते हैं, उसी प्रकार पूरी श्रद्धा के साथ रस्म निभाना चाहिए। संस्कार विहीन पूजा पाठ अर्थहीन होता है। मगर लोग शोरगुल और दिखावा ज्यादा कर रहे हैं।
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-पं. संजय शुक्ल, पीठाधीश्वर, मां काली शक्ति पीठ, निकट रेलवे स्टेशन।
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निकाय क्षेत्रों में प्रतिमा विसर्जन को लेकर सभी अधिशासी अधिकारियों को घाटों के सफाई के निर्देश दिए गए हैं। इसका स्थलीय निरीक्षण भी कराया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्र में ग्राम पंचायत घाटों की सफाई कराएगी। वैसे आयोजन समितियों से जुड़े लोग आम नागरिकों की भी जिम्मेदारी है कि पूजन- सामग्रियों को इधर उधर अपशिष्ट के रूप में न फेंका जाए।
-कमलेश चंद्र, एडीएम
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