बस्ती। सफेदपोशों की गठजोड़ से जमीनों का धंधा खूब फल फूल रहा है। यहां भूमाफिया का सरपरस्त कोई न कोई सफेदपोश होता है। उनकी शह पर बड़े से बड़े जमीन के विवाद चंद लम्हों में सुलझ जाते हैं। सफेदपोश के दबाव में सरकारी मुलाजिम भी इसमें भरपूर सहयोग करते हैं। भूमि विवाद को निपटाने में आने वाला खर्च भूमाफिया वहन करता है। बाद में जमीन पाक साफ होने पर महंगे दरों पर बिक्री कर अच्छा मुनाफा कमा लिया जाता है। फिर क्या शुरूआत में थोड़ी उलझन बाद में उनकी चांदी ही चांदी..। भूमाफियाओं ने यहां जमीन के धंधे का नायाब तरीका ढूढ निकाला है। उनके अलग-अलग क्षेत्र है। पीछे सरपरस्ती में कोई न कोई सफेदपोश होता है। आगे थोड़ा बहुत आपराधिक छवि वाले भूमाफिया होते हैं। ताकि आमजन में नाम का थोड़ा बहुत दहशत हो। बाकी प्रशासनिक मदद के लिए सफेदपोश का हाथ उनके ऊपर रहता है। भूमाफिया क्रीम लोकेशन की विवादित भूमि खोजते हैं। जहां या तो अवैध कब्जा है या फिर वर्षों से मुकदमा है। ऐसी भूमि पर भूमाफियाओं की गिद्ध दृष्टि पड़ जाती है। हां इतना ध्यान जरूर रहता है कि सख्त शासन में दबंगई उजागर न हो वरना लेने के देने पड़ सकते हैं। इसीलिए सबसे पहले काश्तकार को साध लिया जाता है। मरता क्या न करता के तर्ज पर काश्तकार भी उनके साथ चल पड़ते हैं। अमूमन दूसरों के कब्जों में उन्हीं की जमीन होती है जो सबल नहीं होते हैं। विवशता में वह भी भूमाफियाओं के शरण में जाना सुंदर अवसर मानते हैं। मुकदमा या फौजदारी के बजाय औने-पौने में जमीन को कैश करा लेना ही उन्हें तत्काल में मुनासिब लगता है। इस आधार पर भूमाफिया से उनका सौदा राजी खुशी से हो जाता है। इसके बाद बारी आती है जमीन पर कब्जा करने की तो यहां नाम के बदौलत डींग हांकी जाती है।
संबंधित जमीन पर भूमाफिया के पालतू शोहदों की दौड़भाग शुरू हो जाती है। किसी न किसी बहाने मामले को उकसा कर थाने या तहसील पहुंचा दिया जाता है। इस मुहाने पर भूमाफिया की ओर से सफेदपोश की अहम भूमिका शुरू हो जाती है। अंदरखाने में बात मुनाफे की रहती है, लेकिन सार्वजनिक तर्क न्यायसंगत प्रतीत होता है। वह यह कि कमजोर व्यक्ति की जमीन वर्षों से उसके कब्जे में नहीं है। शासन प्रशासन की मदद के बगैर यह संभव नहीं है। सफेदपोश की पैरवी जोर पकड़ती है। उधर, भूमाफिया का खुश करने का मंत्र सरकारी मुलाजिमों को प्रभावित कर देता है। अंतत: एक दो बैठक में ही मामला सुलझ जाता है और हो जाती है अच्छी-खासी कमाई।
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-निष्पक्ष सुनवाई हो तो काश्तकार ही उठाएंगे फायदा
प्रशासनिक गलियारे में निष्पक्ष सुनवाई का ढिढोरा कितना भी पीटा जा रहा हो लेकिन यह सच्चाई से इतर है। यदि भूमि विवाद के प्रकरण सीधे काश्तकार की पैरवी पर निपटा दिए जाए तो भूमाफियाओं की दाल कतई गलने वाली नहीं है। लेकिन खुद के दम पर अपनी जमीन को विवाद से मुक्त कराने के लिए कमजोर तबके के काश्तकारों के लिए लोहे का चना चबाना है। उन्हें न जाने कितने साल तक तहसील और थाने का कितना चक्कर काटना पड़ेगा कुछ कहा नहीं जा सकता है। थक-हारकर वह भूमाफिया की चंगुल में फंस ही जाते है।
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ऐसे होती है पूंजी की व्यवस्था
यदि कोई बड़ा भूखंड है और विवाद में वह उलझा है। पूंजी की ज्यादा जरूरत है तो सफेदपोश या पूंजीपति भी उसमें पर्दे के पीछे से शामिल हो जाते हैं। आगे भूमाफिया होता है लेकिन शेयर सभी का रहता है। किसी का नाम सार्वजनिक होता है तो कोई बिना प्रकाश में आए लाभांश का हिस्सेदार बनता है। इस आधार पर एक सक्षम समूह संबंधित भूखंड को कैश कराने में लग जाता है। जिससे विपक्षी कमजोर महसूस करने लगते हैं। बाद में वह भी शर्तों के अनुसार समझौता कर लेते हैं।
शहर में आ चुके हैं ऐसे कई प्रकरण
शहर में इस तरह के एक दर्जन से अधिक प्रकरण हाईलाइट हुए हैं, जिसे सफेदपोश और भूमाफिया के गठजोड़ से निपटाया गया है। साम, दाम, दंड, भेद हर स्तर पर उतरकर पक्ष-विपक्ष दोनों को अपने अनुकूल कर लिया जाता है और असली मुनाफा भूमाफिया उठा लेते हैं। गांधीनगर, पुरानी बस्ती और मालवीय मार्ग पर अवैध कब्जे वाले मकान और चर्चित भूखंडों में से कुछ निर्विवाद होकर कैश हो गए। जबकि कुछ पर अभी परिस्थितियों को अनुकूल बनाने का तानाबाना बुना जा रहा है। इसमें भूमाफिया और सफेदपोश दोनों शामिल है।
भूमि विवाद से संबंधित प्रकरण पर तहसील प्रशासन गंभीर रहता है। कुछ मामले न्यायिक प्रक्रिया की वजह से लंबित रहते हैं। काश्तकारों की सुनवाई सीधे होगी। उन्हें किसी वैशाखी की जरूरत नहीं है। तहसील दिवस, थाना दिवस का आयोजन इसीलिए होता है। -विनोद कुमार पांडेय, एसडीएम सदर
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केस नंबर-1
मालवीय रोड स्थित एक कॉलोनी में लगभग आठ हजार स्क्वायर फीट में बना शहर की चर्चित प्रापर्टी है। इस पर पहले एक दबंग ने किराएदारी के आधार पर कब्जा किया। बाद में जमीन मालिक ने एक सफेदपोश की अगुवाई में जमीन एक व्यक्ति के नाम अऩुबंध कर दिया। फिलहाल यह विवाद अभी सुलझा नहीं है। किरायेदारी के आधार पर कब्जा बरकरार है। न्यायालय में दोनों पक्षों के बीच मुकदमा लंबित है।
केस नंबर- 2
मालवीय रोड मार्ग के बगल स्थित एक 15 हजार स्क्वायर फीट जमीन की रजिस्ट्री 10 साल पहले हुई थी। वास्तविक काश्तकार को पता ही नहीं चला। अब वह इस भू-खंड पर स्थगन आदेश प्राप्त करने के बाद न्यायालय में मुकदमा लड़ रहे हैं। प्रकरण विचाराधीन है। कई बार राजस्व टीम दोनों पक्षों की ओर से यहां पहुंची भी, मगर कोई परिणाम नहीं आ सका है।
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केस नंबर- 3
पिकौरा शिवगुलाम मोहल्ले में एक व्यावसायिक भूखंड की एक भू माफिया ने अपने नाम रजिस्ट्री कराई। बाद में कुछ काश्तकारों ने इस पर मुकदमा कर दिया। राजस्व टीम दोनों पक्षों की ओर से कई बार पैमाइश भी की और अलग-अलग रिपोर्ट भी दी है लेकिन तहसील स्तर के न्यायालय से किसी के पक्ष में अब तक फैसला नहीं हो सका है।