बस्ती। मंडलीय खाद्य एवं औषधि प्रयोगशाला सात साल बाद भी संचालित नहीं हो पाई है। इससे खाद्य पदार्थों में मिलावट व औषधियों के जांच की उम्मीद को झटका लगा है। विभागीय जिम्मेदारों की यह लेटलतीफी भारी पड़ रही है। जांच के लिए न तो यहां अभी तक मशीन लग पाईं और न ही खाद्य पदार्थ के नमूने की जांच शुरू हुई। प्रयोगशाला के निर्माण में 23.25 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं।
2019 में प्रदेश सरकार ने बस्ती मंडल को सौगात दी थी। मंडल मुख्यालय पर खाद्य एवं औषधि प्रयोगशाला एवं मंडलीय कार्यालय खोलने का निर्देश दिया था। बजट आवंटित होने के बाद बस्ती मंडल में प्रयोगशाला और एफडीए भवन बनना शुरू हुआ था। जिले के राजकीय इंजीनियरिंग कॉलेज के पास तकरीबन 0.435 हेक्टेयर जमीन पर यूपी सिडको यानी कि उप्र समाज कल्याण निर्माण निगम ने प्रयोगशाला का निर्माण शुरू किया था। जिसमें तीन मंजिला मुख्य भवन और लैब दोनों हैं।
खाद्य एवं औषधि प्रयोगशाला का निर्माण कराया गया और भवन को हैंडओवर कराते हुए उसमें कार्यालय का संचालन शुरू करा दिया गया, मगर अब तक इसमें एक भी नमूने की जांच नहीं हो पाई है। प्रयोगशाला संचालित होने के बाद यहां दूसरे मंडलों से भी जांच के लिए नमूने आते, जिनकी जल्दी जांच हो जाती। यही नहीं, यहां का कोई भी व्यक्ति खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांच करा सकता है लेकिन, लापरवाही ने इस उम्मीद को निगल लिया।
सात वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रयोगशाला का संचालन शुरू नहीं हो सका है। विभागीय अधिकारी दावा कर रहे हैं कि प्रयोगशाला संबंधी कुछ सामग्री आ चुकी है, कुछ और आनी है। इसके बाद संचालन हो जाएगा। मैनपावर की भी तैनाती अभी नहीं हो पाया है। विभाग के अनुसार, मशीन व मानव संसाधन की दिक्कत थी, जिसके कारण प्रयोगशाला संचालित नहीं हो पाई है। कुछ मशीनें आ गई हैं, जिन्हें लगाया जा रहा है। उम्मीद है कि जल्द ही प्रयोगशाला चालू हो जाएगी, जिसके बाद नमूनों की जांच रिपोर्ट समय से मिलेगी। साथ ही जरूरतमंद खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता जांच करा सकेंगे।
बाहर भेजकर नमूनों की कराते हैं जांच : मंडल में प्रयोगशाला संचालित न होने के कारण खाद्य विभाग के अधिकारियों द्वारा लिए गए नमूनों की जांच रिपोर्ट समय से नहीं आ पाती है जबकि, इसे 14 दिन में आ जाना चाहिए। होली, दीपावली समेत अन्य त्योहारों में डेढ़-डेढ़ माह तक लिए गए खाद्य पदार्थों के नमूने की जांच रिपोर्ट नहीं मिल पाती है, जिससे मिलावटखोर अपनी दुकान चलाकर लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ करते रहते हैं। इसके पीछे स्थानीय स्तर पर जांच न होना कारण बता रहे, ऐसे में सैंपल बाहर जिलों में भेजते हैं। इसी प्रकार औषधि जांच के लिए वाराणसी या फिर अन्य लैब में भेजते हैं। अभी खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के अधिकारी व निरीक्षक खाद्य पदार्थों का नमूना लेकर जांच के लिए लखनऊ, बनारस व अन्य जगहों पर भेजते हैं। लिहाजा उनकी जांच में जहां देरी होती है, वहीं मिलावटखोरों पर कार्रवाई होने में लंबा समय लग जाता है और तस्करों व मिलावटखोरों के खिलाफ केस में प्रभावी पैरवी नहीं हो पाती है। यही नहीं मिलावटखोरों को यह भी शिकायत रहती है कि जांच में देरी के कारण उनका नमूने के रूप में लिया गया खाद्य पदार्थ गुणवत्ताविहीन हो जाता है।