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Basti News: गेहूं पिसाना छोड़ दिए, घर में पहुंच रहा पैकेट का महंगा आटा... सेहत पर खतरा

Thu, 04 Apr 2024 12:46 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
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कृषि प्रधान देश में बदल रहा खान-पान का तरीका, प्रोसेसिंग आटे से किचेन में तैयार हो रही सफेद रोटी
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गेहूं न चक्की का चक्कर, खरीदकर ला रहे चोकर रहित पैकेट का आटा, स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। कृषि प्रधान देश में खान-पान का तरीका तेजी के साथ बदल रहा है। अब खेत से उपजे गेहूं की डिमांड घरों में कम हो गई है। व्यस्त दिनचर्या के चलते कौन इसे बीने, फटके और समय गंवाए। इसे लेकर चक्की का चक्कर लगाने की झंझट अलग है। इन सबसे बचने के लिए लोग सील बंद पैकेट का आटा खरीदकर फुर्सत ले रहे हैं। इस फेर में लोग गेहूं पिसवाना ही भूल गए। घर-घर सफेद रोटी की चाहत बढ़ गई है। बिना चोकर वाले साफ्ट आटे के उपयोग का चलन बढ़ गया है। हालांकि यह सेहत के लिए फायदेमंद नहीं है। फिर भी घरों में फ्लोर मिल से प्रोसेसिंग के बाद तैयार चोकर रहित आटा बाजार में खास जगह बना ली है। इससे आम ग्राहकों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है तो किसानों को भी इसकी मार झेलनी पड़ रही है।
दरअसल, पैकेट वाले आटे में अधिक सफेदी के चक्कर में फ्लोर मिलों में पिसाई से पहले गेहूं की छंटाई होने लगी। नतीजा यह हुआ कि जो गेहूं किसान से 22 रुपये किलो के भाव - व्यापारी खरीद रहे हैं, उसका आटा प्रोसेसिंग के बाद 40 से 42 रुपये प्रति किलो के भाव बिक रहा है। ज्यादा सफेद रोटी की चाहत में रिफाइंड आटे के सेवन से लोग बीमार हो रहे हैं। क्योंकि रिफाइंड आटे में फाइवर की मात्रा बहुत कम रह जाती है, जबकि कार्बोहाइड्रेट बढ़ा रहता है।
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इसका असर धीरे-धीरे लिवर पर पड़ रहा है। इससे लोगों का पाचन तंत्र खराब हो रहा है। शहरीकरण के चलते लोगों के रहन- सहन बदले हुए हैं। घर में पति-पत्नी दोनों कामकाज हो रहे हैं। ऐसे में उन्हें रसोई घर का सामान खरीदने के लिए भी वक्त नहीं मिल पाता। बाजार ने लोगों की इसी मजबूरी का फायदा उठाया। अब हर सामान पैकेटबंद मिलने लगा। सुविधा हुई तो लोग गेहूं पिसवाने से भी दूरी बनाने लगे। पैकेट का आटा खरीदने की लत बढ़ी तो बाजार में रिफाइंड आटा आने लगा। इसमें चोकर की मात्रा सबसे कम होती है।
एक फ्लोर मिल संचालक ने बताया कि इसके लिए पहले गेहूं की छंटाई होती है, जिससे उसकी ऊपरी परत का छिलका उतर जाता है। यही छिल्का चोकर होता है। इसके निकल जाने के बाद आटा अधिक सफेद होता है। लेकिन इसकी प्रोसेसिंग में खर्च अधिक आता है। आटे की कीमत पर नियंत्रण के लिए मिल मालिकों ने बिचौलियों के सहारे गेहूं खरीदना शुरू किया। बिचौलिए सीधे गांव जाकर किसानों से 21-22 रुपये किलो के भाव खरीद रहे हैं। मिलों में दो से तीन रुपये प्रति किलो मुनाफा पर इसे बेच दिया जा रहा है।
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सस्ते दर पर गेहूं खरीद रहे मिल मालिक
मंडी परिषद के गल्ला व्यापारी सोहन लाल ने बताया कि इस समय 24 से 25 रुपये किलो के भाव से गेहूं बिक रहा है। मिल मालिक इस दर पर गेहूं नहीं खरीद रहे हैं। उन्हें सस्ता चाहिए। इधर गेहूं की पैदावार होने वाली है। फसल लगभग तैयार हो रही है। इसलिए फ्लोर मिलों के एजेंट सीधे किसानों के संपर्क में है। मंझरिया के जगदीश ने बताया कि मिलों के एजेंट सीधे किसानों के दरवाजे पर पहुंचकर गेहूं खरीदने की तैयारी में है। उन्हें नकद भुगतान करने पर 17 से 18 रुपये किलो के भाव से गेहूं उपलब्ध हो जाएगा। यह मिलों पर साल भर के लिए स्टाॅक में रख लिया जाता है।
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गांवों में अभी गनीमत... चल रही चक्की मशीन

गांवों में अभी गनीमत है। यहां पैकेट वाले आटे की डिमांड बहुत ही कम है। गांव में गेहूं पिसवाने का चलन बरकरार है। छोटे कारोबारी गांव में आटा चक्की व चावल तैयार करने वाली मशीन ट्रॉली पर शिफ्ट करके घर- घर दस्तक दे रहे हैं। तीन रुपये प्रति किलो के रेट से दरवाजे पर ही गेहूं पीसकर दिया जा रहा है। इससे लोगों को अपने घर पर ही ताजा व शुद्ध आटा मिल रहा है। इसमें सीधे गेहूं की पिसाई होने से उसमें चोकर मिक्स रहता है। यह सेहत के लिए फायदेमंद होता है।
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लिवर ही नहीं, मधुमेह के लिए भी खतरनाक है यह आटा

गेहूं के छिलके में भरपूर मात्रा में फाइबर होता है। चोकरयुक्त आटा पेट में जाकर अधिक पानी सोखता है। इसीलिए रोटी खाने पर भूख देर से लगती है, लेकिन उसका पाचन आसानी से होता है। लेकिन चोकर विहीन आटे में फाइबर के बजाय कार्बोहाइड्रेट अधिक होता है। यह मधुमेह के रोगियों के लिए ठीक नहीं है। इसके अलावा इस रिफाइंड आटा व मैदा से बने अन्य बजट खाद्य पदार्थ भी पाचन क्रिया के लिए ठीक नहीं होता है। इनके नियमित प्रयोग से लीवर की कार्य क्षमता घटने लगती है। अब लीवर के रोगियों की संख्या बढ़ी है। इसकी वजह चोकर रहित आटा का सेवन ही है।
डॉ. रजत पांडेय, एमडी मेडिसिन।
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आटा चक्की का कारोबार हुआ कम
रौता चौराहे के आटा चक्की के कारोबारी गणेश गुप्ता बताते हैं कि इधर पांच- छह सालों में यह कारोबार पिट गया है। जबसे पैकेट वाले आटा का चलन बढ़ा है गेहूं पिसवाने वालों की संख्या घट गई है। पहले फुर्सत नहीं मिलती थी अब बड़े मुश्किल से प्रतिदिन 5 से 6 बोरी गेहूं चक्की पर आ रही है। कितने लोगों ने यह कारोबार बंद कर दिया है। शहर में 150 से अधिक आटा चक्की पहले थी अब यह घटकर 60- 70 पर आ गई है।
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बाजार 35 से लेकर 45 रुपये प्रति किलो आटा बिक रहा है। इसकी डिमांड भी ज्यादा हो गई है। पहले गल्ला मंडी में लोग गेहूं खरीदते थे। इसे धुलकर सफाई के साथ पिसाया जाता था। मशीनीकरण के युग में अब लोग इतना मेहनत नहीं करना चाहते है। सीधे पैकेट बंद आटा खरीदकर काम चलाया जा रहा है। इसमें समय भी नहीं लग रहा है। फोन पर आर्डर देकर घर मंगा लिया जा रहा है।
हरिश्चंद्र शुक्ल, सचिव, चैंबर ऑफ कामर्स।
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