योजनाएं बेदम, गर्भवती तोड़ रहीं अस्पतालों में दम
- विभागीय रिपोर्ट में इस साल 10 माह में 23 प्रसूताओं की गई जान
- 2020-21 में 30 तो 2021-22 में 39 की हुई थी मौत
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। जिले में जननी सुरक्षा, प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना के अलावा हाईरिस्क प्रेग्नेंसी को लेकर तंत्र सक्रिय है, मगर यहां तीन साल के आंकड़े डरा रहे हैं। यहां साल दर साल गर्भवती की मौत का सिलसिला बढ़ा है। यानी योजनाओं का लाभ गर्भवती को मिला या नहीं इसकी निगरानी करने वाला तंत्र भी सवालों के घेरे में है। गर्भवती व प्रसूताओं के लिए संचालित योजनाएं बेदम साबित हो रही हैं। इस वर्ष 10 माह में 23 गर्भवती/प्रसूताओं ने दम तोड़ दिया।
सरकार का प्रयास गर्भवती व प्रसूताओं की मृत्यु दर को कम करना है, मगर अपने जिले में यह आंकड़ा डरावना है। क्योंकि साल के दस महीने में जहां 23 गर्भवती व प्रसूताएं दम तोड़ चुकी हैं, वहीं पिछले दो साल के आंकड़ों में वर्ष 2020-21 में 30 तो 2021-22 में 39 ने दम तोड़ा है।
विभागीय दावा है कि हाईिरस्क प्रेग्नेंसी व गर्भ के दौरान आशा के माध्यम से लगातार निगरानी की जा रही है, मगर आकस्मिक मौत ने व्यवस्था के दावों की पोल खोल दी है। महिला अस्पताल के चिकित्सकों की मानें तो प्रसूता व गर्भवती की मौत का ज्यादातर कारण अत्यधिक रक्तस्राव व हार्ट अटैक है।
ये हैं सरकारी योजनाएं
जननी सुरक्षा योजना के तहत ग्रामीण एवं शहरी दोनों प्रकार की गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल में प्रसव कराने पर प्रोत्साहन दिया जाता है। इसमें ग्रामीण इलाके की गर्भवती महिलाओं को 1400 रुपये एवं शहरी क्षेत्र की महिलाओं को 1000 रुपये दिए जाते हैं। इसमें इस योजना के तहत गर्भवती महिलाओं को प्रसव के लिए सरकारी अस्पतालों पर संदर्भित करने के लिए आशाओं को प्रति प्रसव ग्रामीण क्षेत्रों में 600 रुपये एवं शहरी क्षेत्रों के लिए प्रति प्रसव 400 रुपये आशाओं को प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है।
प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना योजना
पहली किस्त 1000 रुपये गर्भावस्था के पंजीकरण के समय। दूसरी किस्त 2000 रुपये, लाभार्थी छह महीने की गर्भावस्था के बाद कम से कम एक प्रसव पूर्व जांच करा लेते हैं। तीसरी किस्त 2000 रुपये, जब बच्चे का जन्म पंजीकृत हो जाता है और बच्चे को बीसीजी, ओपीवी, डीपीटी और हेपेटाइटिस-बी सहित पहले टीके का चक्र शुरू होता है।
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बोले सीएमओ
सीएमओ डॉ. आरपी मिश्रा ने कहा कि संस्थागत प्रसव बढ़ाने तथा गांवों में गर्भवती को आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर लगातार प्रयास जारी है। आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है। वैसे मानक से मौत का ग्राफ कम है। एक लाख पर 167 मौत का आंकड़ा मानक है। फिर भी किसी प्रसूता अथवा गर्भवती की मौत न हो इसका पूरा प्रयास किया जा रहा है।
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केस 1- बभनान कस्बे की निवासी मीरा (32) 31 अक्तूबर को कैली चिकित्सालय से गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया गया। प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव के कारण मेडिकल कॉलेज में मौत हो गई।
केस 2- परसरामपुर क्षेत्र के सिकंदरपुर गांव निवासी ज्ञानमती को 22 जनवरी की रात प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिकंदरपुर में भर्ती कराया गया। इसके बाद हालत बिगड़ने पर उसे अयोध्या के लिए रेफर कर दिया गया। जहां गर्भवती की रास्ते में मौत हो गई।