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Basti News: संचालक वही...नाम और जगह बदल चला रहे अल्ट्रासाउंड सेंटर

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बस्ती। स्वास्थ्य विभाग के रजिस्टर में सील तमाम अल्ट्रासाउंड सेंटरों में आज भी मरीज अल्ट्रासाउंड कराने आते हैं। स्वास्थ्य महकमे की निगाह से बचने के लिए कुछ संचालक ने बोर्ड हटा दिए गए, तो नाम और जगह बदल कर पैथालॉजी चला रहे हैं। यहां योग्य चिकित्सक की भी तैनाती नहीं है।
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बता दें कि कुछ दिन पहले अवैध ढंग से संचालित अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर अंकुश लगाने की मुहिम छिड़ी थी, मगर यह दिखावा साबित हुआ। जिन चिकित्सक विहीन अल्ट्रासाउंड सेंटरों को सील किया गया था कुछ ही दिन बाद उनमें से अधिकांश सेंटर चोरी छिपे संचालित होने लगे। छापे में मानक विहीन पाए गए इन अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पाई। विभाग की इस सहूलियत पर मुख्यालय से लेकर ग्रामीण अंचल तक बिना योग्य डॉक्टर के ही कई अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित किए जा रहे हैं।
जानकारों ने बताया कि शहर और ग्रामीण अंचलों में अल्ट्रासाउंड सेंटरों की बाढ़ आ गई है। छह माह पहले ऐसे सेंटरों पर अंकुश लगाने के लिए सड़कों पर टीम उतरी थी। तमाम सेंटरों पर छापेमारी की गई। 10 मार्च को सल्टौआ क्षेत्र में अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर पर डिप्टी सीएमओ ने मय टीम छापेमारी की थी। कागजात न दिखाने पर अस्पताल समेत सेंटर को सील कर दिया गया था। बताया गया कि कुछ दिन बीतने के बाद, अब दूसरे रास्ते से अस्पताल धड़ल्ले से चल रहा है।
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इसी प्रकार कुदरहा में तीन सेंटर सील हुए थे, मगर न मशीन जब्त किए न ही अन्य कार्रवाई हुई। यहां भी बाद में गोपनीय तरीके से सेंटर संचालित मिले। कुसौरा में भी यही हाल है। यहां भी बिना डॉक्टर के सेंटर संचालित मिला था, उसे सील कराया गया। बाद में नाम बदलकर फिर से अल्ट्रासाउंड खोल लिया गया। वहीं, जिला महिला अस्पताल के सामने संचालित तीन ऐसे अल्ट्रासाउंड सेंटरों का खुलासा हुआ जहां डॉक्टर नहीं थे। फर्जी तरीके से बाहरी व्यक्ति बैठकर जांच और रिपोर्ट बना रहा था।
सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद सीएमओ डॉ. राजीव निगम ने तीनों संचालकों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। खैर, यह महज बानगी हैं, ऐसे न जाने कितने सेंटर चल रहे जो विभाग वहां तक पहुंच नहीं पा रहा हैं। कारण, कि बिचौलिए अंदरखाने तक मामला सेट किए हुए हैं। इससे पहले आठ ऐसे चिकित्सकों के नाम उजागर हुए थे, जो यहां सहमति पत्र दिए ही नहीं थे और डिग्री लगाकर सेंटर पंजीकृत करवा लिए थे। बाद में ऐसे सेंटरों का नवीनीकरण खत्म कर दिया गया था। बता दें कि जिले में सिर्फ 118 सेंटर ही पंजीकृत हैं।
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सेंटरों में हावी हैं मरीज माफिया
मरीज माफियाओं का काकस अल्ट्रासाउंड सेंटरों से लेकर सरकारी अस्पतालों तक है। उन्हीं के दम पर अवैध अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालित हो रहे हैं। यहां मरीजों को पहुंचाने की जिम्मेदारी मरीज माफियाओं की रहती है। प्रति मरीज उनका कमीशन भी निश्चित है। जिला महिला अस्पताल, जिला अस्पताल, ओपेक चिकित्सालय से लेकर ग्रामीण अंचल के हर्रैया स्थित महिला चिकित्सालय, मुंडेरवा, रुधौली, सल्टौआ, कप्तानगंज सीएचसी तक मरीज माफियाओं का संजाल बिछा हुआ है। इनके एजेंट अनाधिकृत रूप अस्पताल के भीतर डॉक्टरों के चैंबर तक मौजूद रह रहे हैं। उनके दबाव में चिकित्सक मरीजों को अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दे रहे हैं। इसके तुरंत बाद एजेंट सक्रिय हो जा रहे हैं। वह हमदर्द की भूमिका में आकर मरीज को सेटिंग के अल्ट्रासाउंड सेंटर पर पहुंचा रहे हैं। प्रशासनिक सख्ती के दौरान दो चार दिन यह खेल बंद रहता है इसके बाद फिर शुरू हो जाता है। विभागीय जिम्मेदारों की संलिप्तता के चलते इस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है।

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सरकारी अस्पतालों से बाहर भेजे जाते हैं मरीज
मरीज माफियाओं की विभाग से तगड़ी जुगलबंदी के चलते सरकारी अस्पतालों में मरीजों का अल्ट्रासाउंड नहीं हो पा रहा है। महिला अस्पताल में अल्ट्रासाउंड यूनिट अक्सर किसी न किसी कारण बंद रहती है। खुलने पर नंबर अधिक होने पर मरीजों को बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने की सलाह दी जा रही है। यहां अलग-अलग निजी सेंटरों के दलाल मरीजों को गुमराह कर अपना मतलब सिद्ध कर रहे हैं। यहीं हाल जिला अस्पताल में भी है। अल्ट्रासाउंड न होने से मरीज बाहर आकर निजी सेंटरों पर अल्ट्रासाउंड करा रहे हैं। वहीं ओपेक कैली के अल्ट्रासाउंड यूनिट में अपेक्षा से अधिक भीड़ रहती है। यहां एक से दो दिन नंबर आने में लग रहे हैं। इसलिए मरीज यहां आने से किनारा कस रहे हैं।

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बाहर अल्ट्रासाउंड कराने के लिए मजबूर हो रहे मरीज
सरकारी अस्पताल में पहुंचने वाले महिला-पुरुष मरीज बाहर से अल्ट्रासाउंड कराने के लिए मजबूर किए जा रहे हैं। तीमारदार राजेश ने बताया कि चिकित्सक बीमारियों का सटीक पता लगाने के लिए जब अल्ट्रासाउंड अनिवार्य बता रहे हैं तो उन्हें सरकारी सेवा के रूप में केवल ओपेक चिकित्सालय कैली का ही विकल्प सुझाया जा रहा है। ऐसे में जिला महिला चिकित्सालय, जिला अस्पताल एवं सीएचसी के मरीज लंबी दूरी तय कर वहां नहीं पहुंच पा रहे हैं। यदि पहुंच भी गए तो नंबर कब आएगा इसका कोई ठिकाना नहीं है। नतीजा विवश होकर मरीज 900 रुपये देकर निजी अल्ट्रासाउंड सेंटरों पर जांच करवा रहे हैं। जानकारों की मानें तो सेंटर संचालकों द्वारा इसमें से मरीज माफिया और संबंधित चिकित्सक दोनों का हिस्सा पहुंचाया जाता है।


नाम बदलने का चल रहा खेल
जिले में अस्पतालों के पंजीकरण (लाइसेंस) के बाद अब अल्ट्रासाउंड सेंटरों के पंजीकरण और नाम बदलने का जबरदस्त खेल चल रहा है। स्वास्थ्य विभाग पहले उन्हीं सेंटरों को पंजीकृत कर रहा है और बाद में कमियां दिखाकर सील कर रहा है। इसके बाद संचालक उसी भवन और स्थान पर नए नाम से अल्ट्रासाउंड का पंजीकरण करा ले रहे हैं। यही नहीं, रेडियोलॉजिस्ट की डिग्री लगाकर पंजीकरण कराकर दूसरे व्यक्ति से जांच कार्य करवा रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि सांऊघाट में पंजीकृत अल्ट्रासाउंड सेंटर 40 किमी. दूर बभनान गोंडा में संचालित हो रहा है। गौर में भी इसी प्रकार एक प्रकरण है। बाजार में अल्ट्रासाउंड पंजीकरण कराया और संचालित सीएचसी गेट पर कर रहे। तीसरा प्रकरण एक सेंटर का पंजीकरण पीसीपीएनडीटी में है, मगर संचालित कहां हो रहा है, पता नहीं। बनकटी में एक सेंटर अवैध तरीके से चल रहा है। इन सेंटरों के संचालकों को 30 मार्च 2026 को नोटिस जारी किया गया, मगर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है। बताते हैं कि इन अल्ट्रासाउंड संचालकों का जुगाड़ ऐसा है कि वह कभी भी और कहीं भी अपने सेंटर का पंजीकरण करा ले रहे हैं। डिग्री का इस्तेमाल तो ऐसे सुनियोजित तरीके से कर रहे हैं, जैसे कोई फोटो कापी। सूत्रों ने बताया कि इसी प्रकार पैथालॉजी में भी गड़बड़ झाला है। डॉक्टर के बिना सेंटर चल रहे। बाहरी व्यक्ति जांच रिपोर्ट बनाकर मरीजों को दे रहे। मरीज छले जा रहे और विभाग मौन बना हुआ है।
कोट
सील सेंटर यदि खुल रहे हैं तो इसकी जांच कराई जाएगी। सात अल्ट्रासाउंड सेंटर संचालकों को नोटिस जारी किया गया है। चार पुराने और तीन नए प्रकरण हैं। नोडल अधिकारी को मौके पर भेजा जाएगा।
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-डॉ. राजीव निगम, सीएमओ, बस्ती।
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