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रसखान और कबीर की परंपरा को आगे बढ़ा रहे इद्रीस

Mon, 10 Oct 2016 11:37 PM IST
ब्यूरो अमर उजाला/ बस्ती
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दुर्गा पूजा समारोह में भजन गाते मोहम्मद इद्रीस
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सदियों पहले संत रसखान एवं कबीर ने हिंदू-मुस्लिम एका की जो राह बनाई थी, उसी पर चलकर मोहम्मद इद्रीस राम कृष्ण की भक्ति रस मेेेे ऐसे डूबे कि कब लोगों के बीच अनूठी मिसाल बन गए उन्हें ही नहीं पता चला । जज्बा ऐसा है कि मामूली पढ़े लिखे होने के बावजूद उर्दू के अलावा हिंदी और संस्कृत में स्वरचित पद सुनाकर वे लोगों को अनायास अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। क्षेत्रीय हिंदुओं के कोई भी त्योहार व धार्मिक आयोजन मोहम्मद इद्रीश के बगैर अधूरा सा लगता है । 
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 इस्लाम को मानने वाले इद्रीश भगवत भक्ति में डूबकर जब वे राम चरित मानस और भजन गाते हैं  तो बरबस लोगों के आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं। कलवारी थाना क्षेत्र के पाऊँ  कस्बा निवासी मोहम्मद इद्रीश वर्षों से गंगा जमुनी तहजीब में  रंगकर ईश्वर का गुणगान कर रहे हैं। धर्म से ऊपर उठकर भक्ति का प्रचार उनके जीवन का उद्देश्य बन गया है। उनका कहना है कि सबसे बड़ा धर्म इंसानियत का  है।  

इद्रीस बताते हैं कि संगीत के प्रति बचपन से ही एक जुनून सवार था कि हम पढ़ लिख कर एक दिन संगीत के  क्षेत्र में देश का नाम रोशन करेंगे। लेकिन गरीबी आड़े आ गई केवल कक्षा दो तक ही पढ़ सके और घर वालों का फरमान आ गया कि रोजी रोटी जुटाने के लिए अब कुछ काम करो। बचपन से सुरीली आवाज के  कारण गांव के लोगों ने चंदा लगाकर तीस रूपये में हारमोनियम खरीद दिया था। गांव से पांच किलोमीटर दूर गायघाट बाजार के झारखंडेश्वर नाथ धाम मंदिर पर रासलीला चल रही थी। भगवान की लीला देख रसमर्मज्ञ इद्रीस अपनी सुधि बुद्धि  खोकर एक सप्ताह तक लीला का दर्शन करते रहे। यह देख मंदिर के महंत बाबा चेतनदास ने भोजन वस्त्र के अलावा रहने की व्यवस्था दे दी। संगीत कला में  माहिर बाबा ने ढोलक हारमोनियम में पूरी तरह पारंगत कर दिया। बाबा से  गुरुमंत्र लेकर यही से विभिन्न नाट्यमंच में काम कर जीविकोपार्जन के अलावा संगीत की पिपासा भी शांत होती रही । 
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