बस्ती। बच्चे ही देश के भविष्य हैं। देश का कोई भी बच्चा कुपोषित न रहे इसके लिए कई योजनाएं भी चलाई जा रही हैं। इन योजनाओं के क्रियान्वयन पर हर माह लाखों रुपये खर्च हो रहे हैं, लेकिन जिले में इसका असर होता नहीं दिख रहा है।
वर्ष 2016 में जिला चिकित्सालय में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत पोषण पुनर्वास केंद्र की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य कुपोषित बच्चों को पोषित करना है। शुरुआती दिनों में तो यह केंद्र सुचारु तरीके से चलता रहा, लेकिन समय बीतने के साथ केंद्र पर बच्चों के आने की संख्या कम होती गई। केंद्र तक बच्चों को लाने की जिम्मेदारी आशा व आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं सहित अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की है लेकिन जिम्मेदार अपने कर्तव्य का ठीक ढंग से निर्वहन नहीं कर रहे हैं। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 2017 में अप्रैल से दिसंबर अंत तक इस केंद्र में मात्र 123 बच्चों का ही उपचार हो सका। वर्ष 2018 में अप्रैल से दिसंबर अंत तक 123 बच्चों का इलाज किया गया है। जबकि पोषण समिति की बैठक में रखे गए आंकड़ों पर नजर डालेंगे तो जिले में दो लाख से अधिक बच्चे अति कुपोषित की श्रेणी में हैं।
यहां स्टॉफ पर एक नजर
जिला अस्पताल में स्थापित पोषण पुनर्वास केंद्र में चार स्टॉफ नर्स, एक मेडिकल अफसर, एक न्यूट्रीशियन, एक रसोइया, एक स्वीपर की तैनाती है। इस केंद्र में छह माह से छह वर्ष तक के कुपोषित बच्चों का उपचार होता है। इस दौरान बच्चों की मां का भी यहां रहना अनिवार्य होता है। जिन्हें सुबह का नाश्ता व दोनों समय पोषणयुक्त भोजन दिए जाते हैं। बच्चों को यहां 14 दिन तक विशेष देखरेख में रखा जाता है। स्थिति में सुधार होने पर इन्हें घर भेज दिया जाता है।
पुनर्वास केंद्र प्रभारी की सुनिए
पोषण पुनर्वास केंद्र के प्रभारी डॉ. नवल वर्मा का कहना है कि इस केंद्र तक बच्चों को लाने की जिम्मेदारी स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की है। उनका कहना है कि इस केंद्र का प्रचार-प्रसार हो तो इसके बारे में लोगों को जानकारी हो सकेगी। जिससे अधिक से अधिक कुपोषित बच्चों को केंद्र में मिलने वाली सुविधाओं से लाभान्वित किया जा सकेगा।