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हाईटेक होती पुलिस में टोटकों का बोलबाला

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हाईटेक होती पुलिस में टोटकों का बोलबाला
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बस्ती। वैज्ञानिक, तकनीकी तथ्यों, साक्ष्यों और गवाहों के बयान को आधार बनाकर चलने वाली पुलिस आज भी टोटकों की गिरफ्त से आजाद नहीं हो सकी। पुराने जमाने से चली आ रही बिना आधार वाली तमाम धारणाओं का आज भी बोलबाला है। हो सकता है यह सुनकर आप हैरान रह जाएं, लेकिन सच यह है कि हाईटेक हो चुकी पुलिस ऐसा करने से गुरेज नहीं करती।
सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी लक्ष्मी नारायण बताते हैं कि वर्षों पुलिस की सेवा के दौरान कई जनपदों में ऐसे टोटके प्रचलित होने की बात सामने आ चुकी है, लेकिन इससे विभाग की नियमावली से कोई नाता नहीं है। यह निजी तौर पर कुछ पुराने पुलिसकर्मी अब भी आजमाते हैं। थाने से इलाके में जाने के लिए रवानगी और वापसी में आमद दर्ज करने में आड-ईवेन (सम क्रमांक-विषम क्रमांक) का टोटका वर्षों से आजमाए जा रहे हैं। थाने की जनरल डायरी (जीडी) में सम संख्या वाले क्रमांक में आमद और विषम संख्या वाले क्रमांक पर रवानगी करने से बचते हैं। इस क्रम संख्या पर पुलिसकर्मी ड्यूटी पर पहुंचता है तो वह क्रम बदलने तक इंतजार करता है। क्रम संख्या आठ, 18, 28 जैसे सम क्रम संख्या पर आमद नहीं करते। तीन, 13 और 23 जैसी विषम क्रम संख्या होने पर रवानगी दर्ज कराने से बचते हैं। जीडी (जनरल डायरी) में तस्करा लिखने के लिए काले रंग की स्याही इस्तेमाल भी नहीं होता है। अफसर और मातहत कारण पूछने पर हंसकर टाल देते हैं। दबी जुबां बस यही कहा जाता है कि सुरक्षित नौकरी और क्राइम कंट्रोल के लिए ऐसे पैंतरे आजमाने में क्या हर्ज। पुलिस की ओर से वर्षों से जीडी लिखने में काली स्याही वाला पेन इस्तेमाल न करने का दस्तूर आज भी कायम है।
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दंग कर देंगे टोटके
यदि थाने के मुंशी का रूल गिर जाए तो थाने में किसी की मौत की रिपोर्ट आती है। थाने के लॉकअप (हवालात) में यदि कोई आरोपी न हो तो उसे खुला रखा जाता है। इससे यह दर्शित होता है कि थाने में कोई आरोपी नहीं है। थाने के चौखट में यदि कोई खड़ा हो जाए तो उसे तत्काल यह कहकर हटा दिया जाता है कि या तो अंदर आ जाओ या बाहर। ज्यादा देर किसी के चौखट पर खड़े रहने से गंभीर अपराध होने की आशंका या थाने के लिए अच्छा न होने की बात कही जाती है।
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इस तरह की परंपरा नहीं : एसपी
एसपी हेमराज मीणा का कहना है कि इस तरह की कोई परंपरा उनके संज्ञान में नहीं है। पुलिसकर्मी अपने दायित्व का तत्परता से निर्वहन कर रहे हैं। किसी की ऐसी निजी मान्यता हो सकती है। विभागीय स्तर पर इसका कोई वजूद नहीं है।
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