युवाओं के आत्मघाती तेवर से सकते में अभिभावक
जिले में आत्महत्या की लगातार बढ़ रही फेहरिस्त
आठ महीने में आत्महत्या की 37 घटनाएं
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। चुनौतियों से लड़कर मिसाल पेश करने की ताकत रखने वाली युवा पीढ़ी आत्मघाती होती जा रही है। हालात का सीना तानकर सामना करने की जगह कनपटी पर पिस्तौल रखकर फायर करने और रेल की पटरियों के बीच बैठकर अपने ऊपर से ट्रेन गुजार देने की घटना सामने आ रही हैं। युवाओं के इस कायराना तेवर से अभिभावक भी सकते में हैं।
आठ महीने में खुदकुशी की 37 घटनाओं में 29 मामले 18 से 32 साल तक के युवाओं के पाए गए। इनमें 60 फीसदी युवतियां और 40 फीसदी युवा शामिल हैं। इनमें आधे से ज्यादा मामलों में इहलीला खुद समाप्त करने के पीछे की वजह भी कोई नहीं जान पाया।
आत्महत्या की जितनी घटनाएं सामने आईं उनमें प्रेम प्रसंग और घरेलू झगड़े सबसे ज्यादा पाए गए। एसपी आशीष श्रीवास्तव का कहना है कि इसमें परिवार वालों की भूमिका सबसे अहम होती है। जब भी परिवार का कोई सदस्य असामान्य लगे तो बिना संकोच किए उससे खुलकर बात करनी चाहिए। जरूरत महसूस हो तो मनोचिकित्सक के पास ले जाना सबके हित में होगा।
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नहीं पता चल पाती वजह
पुलिस अधिकारी कहते हैं कि ज्यादातर मामलों में अभिभावक नहीं चाहते कि उनके भाई, बहन, बेटी या बेटे की दुर्भाग्यपूर्ण मौत के बाद पुलिस बखिया उधेड़े। इसलिए वे तहरीर नहीं देते। इससे पुलिस को भी मौका मिल जाता है और पोस्टमार्टम के बाद शव परिवार वालों को अंतिम संस्कार के लिए सौंप देती है। ऐसे में ज्यादातर मामलों में खुदकुशी का कारण पता नहीं चल पाता। हालांकि मोहल्ले अथवा गांव के लोग कुछ मामलों में वजह जान जाते हैं, लेकिन विवाद के डर से जुबान बंद रखना ही मुनासिब समझते हैं।
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सबसे ज्यादा फंदा लगाकर दे रहे जान
हाल की घटनाओं पर गौर करें तो खुदकुशी करने के लिए फांसी का फंदा लगाने का तरीका सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। ट्रेन के आगे कूदकर जान देने की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। नदी या नहर में कूदकर जान देने वालों की तादाद भी कम नहीं है। जहरीला पदार्थ खा लेने, बंदूक से गोली मार लेने, आत्मदाह कर लेने की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं।
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कोट
आभाषी दुनिया के प्रभाव के कारण युवा अपने आसपास के माहौल से तालमेल नहीं रख पाते हैं। कई बार वे दोहरा जीवन जीने लगते हैं। अपनी दुनिया में खोए रहने के कारण इनका स्वभाव आत्मघाती होता जा रहा है। गुमसुम रहने और अपने में खोए रहने के कारण अपने मनोभावों को नियंत्रित नहीं कर पाता। अंतत: वह अपनी ही जान का दुश्मन बन जाता है।
डॉ. रघुवर पांडेय, समाजशास्त्री