भूमि प्रबंधन समिति के पदाधिकारी, दबंग इस खेल में आगे
ज्यादातर ग्राम प्रधानों ने कर रखा है सरकारी भूमि पर कब्जा
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। सरकारी भूमि पर कब्जा करने के मामले में मेड़ ही खेत खाने या चौकीदार के डाका डालने वाली कहावती चरितार्थ होती है। यानी जिसके जिम्मे इन जमीनों की देखभाल की है, वही इस पर कुंडली मारकर बैठे दिख रहे हैं। इसमें ग्राम प्रधान सबसे आगे हैं।
देवरिया की घटना में भी देखा गया कि ग्राम प्रधान रहने के दौरान ही आरोपी ने सबसे ज्यादा ग्राम समाज की भूमि पर कब्जा किया है। यहां भी पाया जा रहा है कि खलिहान, बंजर, नई परती आदि ग्राम समाज की भूमि पर ज्यादातर ग्राम प्रधानों, पूर्व प्रधानों का कब्जा है। भूमि प्रबंधन समिति का अध्यक्ष होने के नाते उसी पर इस जमीन की सुरक्षा का जिम्मा होता है। इसलिए गांव का कोई व्यक्ति आपत्ति भी नहीं कर पाता। ऐसे तमाम मामले सामने आए हैं जिनमें ग्राम प्रधान, पूर्व प्रधान के कब्जे में ग्राम समाज की भूमि पाई जा चुकी है। कई मामलों में हाईकोर्ट तक से कब्जा हटवाने का आदेश दिया जा चुका है। मगर तहसील प्रशासन उसे भी नजरंदाज कर देता है।
सदर तहसील क्षेत्र के छरदही पंचायत के पूर्व प्रधान रमेश चौधरी सहित महेश व सुरेश ने गांव के ही गाटा संख्या 345 मि. पर 0.010 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा कर पक्का मकान बनवा लिया है। यह गाटा राजस्व अभिलेख में गड़ही के नाम दर्ज है। फरवरी 2023 को पैमादश में इसकी पुष्टि राजस्वकर्मी कर चुके हैं। तहसीलदार न्यायालय जून 2023 में पूर्व प्रधान को उक्त गाटा से बेदख करने का आदेश दे चुका है, लेकिन स्थिति यथावत है।
हर्रैया तहसील क्षेत्र के ग्राम पंचायत इटवा के प्रधान प्रवीन कुमार ने गांव के ही गाटा संख्या 231 में 0.033 हेक्टेयर जमीन पर कब्जा कर पक्का निर्माण करा लिया है। राजस्व अभिलेख में यह जमीन नवीन परती के नाम दर्ज है। तहसीलदार न्यायालय नवंबर 2022 में प्रधान को उक्त गाटा से बेदखल करने का आदेश दे चुका है, लेकिन कब्जा यथावत है।
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प्रधानी हटने के बाद खुलती है पोल
जानकार बताते हैं कि ग्राम प्रधान के कब्जा का मामला तब खुलता है जब वह पद से हट जाता है। उसका विपक्षी प्रधान होने के बाद इसकी शिकायत कर तहसील प्रशासन से कब्जा मुक्त कराने की पैरवी करता है। कई गांवों में विपक्षी भी इस अंधेरगर्दी को उजागर करने के बजाय बाकी बची जमीन पर कब्जा करने की कोशिश में लग जाते हैं।