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Basti News: अभिलेखागार से नौ साल की खतौनी लापता... पूछने पर जिम्मेदार कह रहे हैं चल रही जांच

Mon, 16 Oct 2023 12:11 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
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पिकौरा शिवगुलाम मौजे की 1381 से 1390 फसली वर्ष की नान जेडए खतौनी खोजने में जिम्मेदारों को छूट रहा पसीना
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- जमींदारों की जगह जमीनों पर दूसरों का कब्जा, वर्तमान खतौनी में नाम बदलने से बेगाना बनकर घूम रहे जमीन मालिक
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। जमीन हथियाने के खेल में राजस्व विभाग के वर्षों पुराने रिकाॅर्ड भी लापता कर दिए जा रहे हैं। सदर तहसील के पिकौरा शिवगुलाम मौजे की नौ वर्ष की नान जेडए खतौनी कलक्ट्रेट अभिलेखागार एवं तहसील के रिकॉर्ड रूम से लापता है। फसली वर्ष 1381 से 1390 तक इस मौजे की नान जेडए खतौनी खोजने में अब प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं। प्रभावित काश्तकार जिम्मेदारों से संबंधित अवधि की खतौनी पूछ रहे हैं तो यही जवाब सुनाया जा रहा है कि मामले की जांच चल रही है। वर्तमान में जमीन की नवैयत बदल जाने पर काश्तकार बेगाना बनकर घूम रहे हैं।
कलक्ट्रेट स्थित जिला अभिलेखागार से पिकौरा शिवगुलाम मौजे की नौ वर्ष की नान जेडए खतौनी लापता है। तहसील में भी इसका रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। बीस साल से तमाम फरियादी अपनी जमीन के मुआयने के लिए भटक रहे हैं। इसकी पोल तब खुली जब एक जमींदार कुनबे के काश्तकार ने अपनी नान जेडए भूमि का मुआयना कराने की मांग की। बीस साल से उन्हें इस मौजे की नौ वर्ष के अवधि की खतौनी अब तक नहीं मिल पाई है।
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राजस्व विभाग प्रत्येक फसली वर्ष में खतौनियों को अपडेट करता है। पुरानी खतौनियों को कलक्ट्रेट स्थित जिला अभिलेखागार में जमा करा दिए जाते हैं, ताकि काश्तकार के मुआयने में, विभाग या न्यायिक प्रक्रिया में पुराने अभिलेख से सत्यता का मिलान किया जा सके। नान जेडए, सरकारी एवं सार्वजनिक उपयोग की जमीन को हड़पने में पुरानी खतौनियों को ही आधार बनाया जाता है। इसमें छेड़छाड़ के बगैर नई खतौनी में नाम दर्ज करा पाना संभव नहीं है।
पिकौरा शिवगुलाम मौजे की करीब 40 साल पहले की नौ वर्ष की नान जेडए खतौनी लापता होने की सरकारी मुलाजिम लिखित रूप से यह स्वीकार भी कर चुके हैं। फरियादी के प्रार्थनापत्र पर 20 साल पहले जिला अभिलेखागार की ओर से पिकौरा शिवगुलाम मौजे की फसली वर्ष 1381 से 1390 तक की नान जेडए खतौनी तहसील से जमा न किए जाने का स्पष्ट उल्लेख किया गया है। वहीं, तहसील प्रशासन ने भी फरियादी के प्रार्थनापत्र पर इस अवधि की खतौनी का विवरण रिकाॅर्ड में अंकित न होना बताया है। फरियादी ने अपनी जमीन के लिए मुख्यमंत्री, राजस्व परिषद तक से गुहार लगा चुका है, लेकिन अभिलेख न मिलने से विधिक कार्रवाई नहीं हो पा रही है।

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इनकी जमीन पर दूसरों का कब्जा
पिकौरा शिवगुलाम के रहने वाले सदानंद शुक्ल के पूर्वजों के नाम भुजैनी पोखरा के नाम से नान जेडए जमीन दर्ज थी। 20 साल पहले उन्हें पता चला कि संबंधित भूखंड दूसरों के नाम दर्ज हो गया है और कब्जा भी हो चुका है। उन्होंने पूर्वजों की नान जेडए जमीन की छानबीन शुरू की। पता चला कि फसली वर्ष 1390 के बाद की खतौनी में संबंधित भूखंड पर दूसरों का नाम दर्ज है। सत्यता की जांच के लिए उन्होंने इसके पूर्व फसली वर्ष 1381 से 1390 तक के खतौनी के मुआयना के लिए तहसील में प्रार्थना पत्र दिया। वहां से बताया गया कि इस अवधि की खतौनी दाखिल दफ्तर हो गई है। वह जिला अभिलेखागार गए, जहां से संबंधित अवधि की खतौनी जमा न होने संबंधी टिप्पणी के साथ उन्हें लौटा दिया गया। बाद में तत्कालीन तहसीलदार ने भी इस अवधि की खतौनी का ब्योरा विभागीय रिकाॅर्ड में अंकित न होना बताया। 20 साल बीत गए, अब तक उन्हें इस अवधि की खतौनी मुआयने के लिए उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है।

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जमीन हड़पने के लिए खतौनी लापता करने का आरोप
काश्तकार सदानंद का आरोप है कि उनकी एवं अन्य जमींदारों की नान जेडए जमीनों के कुछ नंबर दूसरों के नाम दर्ज कराने के चक्कर में ही पिकौरा शिवगुलाम मौजे की नौ वर्ष की खतौनी तहसील और अभिलेखागार से लापता की गई है। क्योंकि जिस अवधि की खतौनी लापता है उसी के बाद के फसली वर्ष की खतौनी में दूसरों का नाम दर्ज पाया जा रहा है। इसके पहले की खतौनी से मिलान किए बगैर सत्यता सामने नहीं आएगी। हम लोग बगैर साक्ष्य जुटाए विधिक प्रक्रिय भी नहीं अपना सकते है। तहसील प्रशासन इस मामले में कोई मदद करने को तैयार नहीं है। जबकि रिकाॅर्ड रूम में सभी अभिलेख मौजूद होने चाहिए।

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दो माह पूर्व तूल पकड़ा था मामला
नौ फसली वर्ष की खतौनी लापता होने का मामला दो माह पूर्व तूल पकड़ा था। तत्कालीन डीएम ने मामले की जांच एक एसडीएम स्तर के अधिकारी को सौंपी थी। उन्होंने कहा था कि खतौनी न मिलने पर दोषियों पर केस दर्ज कराया जाएगा। तभी से जिम्मेदार अफसर काश्तकारों को जांच चलने का जवाब सुना रहे हैं। जबकि डीएम के स्थानांतरित होते ही मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
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कोट
नान जेडए जमीन जमींदारों की होती है। यदि इस पर दूसरों का कब्जा है तो वह सिर्फ इसका उपभोग कर सकते हैं। इसे बेच नहीं सकते हैं। मालिकाना हक जमींदार का ही रहेगा। इसके अलावा राजस्व विभाग फसली वर्ष के हिसाब से खतौनी हर साल अपडेट करता है। वर्तमान में खतौनी का फसली वर्ष 1430 चल रहा है। जहां तक रिकाॅर्ड न मिलने की बात है तो एक समय के बाद पुरानी खतौनियों को नष्ट करने का भी प्रावधान है। अभिलेखागार में इसका भी उल्लेख होता है। यह जांच का विषय है कि संबंधित मौजे की नान जेडए खतौनी किन परिस्थितियों में उपलब्ध नहीं है।
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धर्मेंद्र नारायण त्रिपाठी, एडवोकेट, कलक्ट्रेट
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प्रकरण संज्ञान में है। दो माह पहले डीएम ने इस मामले की जांच बैठाई थी। उसमें क्या हुआ यह जांच अधिकारी ही बता पाएंगे। वैसे तहसील स्तर से भी लापता खतौनियों की खोजबीन की गई थी। मामला काफी पुराना होने के नाते कुछ पता नहीं चल सका।
-विनोद कुमार पांडेय, एसडीएम सदर
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