लगभग 17 साल पहले बंद हुई मुंडेरवा चीनी मिल के पुन: चलने की घोषणा से किसानों, कारोबारियों और आसपास के लोगों ने इसे सरकार का किसान हित और सबका विकास करने वाला कारगर कदम बताया।
प्रशासन के अधिकारियों का मिल का जायजा लेने के बाद स्थानीय लोगों में यह आस बंधी है, कि अब फिर से यह क्षेत्र जगमग होगा। हांलाकि मिल को दोबारा चालू होने में अभी समय लग सकता है, मगर स्थिति अभी से व्यवस्थित होने लगी है। भविष्य की योजनाएं बनने लगी हैं। इस मिल को चलाने के लिए चलाए गए आंदोलन में तीन किसान अपनी जान भी दे चुके हैं। सबसे अधिक खुशी इसी परिवार को हो रही है।
वर्ष 1932 में स्थापित मुंडेरवा चीनी मिल का सफर काफी लंबा रहा। मिल से क्षेत्र के किसान केे साथ छोटे मोटे कारोबार करने वाले परिवार का भविष्य भी जुड़ा हुआ था। वर्ष 1999 में जब यह चीनी मिल बंद हुई तो कइयों के जीविका पर संकट आ गया। लोग आज भी अपनी पीड़ा को कम नहीं कर पाए। राज्य चीनी मिल निगम की इस मिल के बंद होने से लगभग 650 कर्मचारियों की आजीविका भी छिन गई। इनमें तो कई ऐसे हैं जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, मगर अब उनकी संतानें आस में हैं।
गन्ना विभाग के मुताबिक मिल बंद होने तक पेराई की क्षमता 7110 क्विंटल थी। वर्ष 1999-2000 के सीजन में इस इलाके में 6433 हेक्टेअर क्षेत्रफल में किसान गन्ने की खेती करते थे। हालांकि इन 17 सालों में रकबा कम नहीं हुआ बल्कि बढ़ा ही है। 2016-17 के सीजन में 6799 था जो 66 हेक्टेअर बढ़ गया। जिला गन्ना अधिकारी रंजीत सिंह निराला कहते हैं कि वर्तमान में न तो किसान और न कर्मचारी किसी का बकाया मिल पर नहीं है।
क्या कहते हैं किसान
कुदरहा जनवल गांव के किसान राजू चौधरी का कहना है कि गन्ना की खेती किसानों की रीढ़ थी, इसी के बदौलत सभी जरूरतें पूरी होती थी। मुंडेरवा मिल बंद होने के बाद से गन्ना बेचना कठिन हो गया है। इसी ब्लॉक के ग्राम सिंकदरपुर के पप्पू पांडेय का कहना है कि कुदरहा क्षेत्र में गन्ना किसानों की सबसे प्रिय फसल था, जब से मिल बंद हुई, दाम कम हो गया और समय से भुगतान नहीं हुआ।
बनकटी के सजनाखोर के बाबूराम चौधरी कहते हैं कि अब किसानों में यह उम्मीद जगी है कि मिल चालू होगी और समय से भुगतान हो सकेगा। बनकटी के राम गुलाब मौर्य ने बताया कि समय से पेमेंट और गन्ने की पर्ची न मिलने के कारण गन्ना की बुआई से मोह भंग हो गया है। सूरज चौधरी का कहना था कि गन्ना नकदी फसल होने के बाद उसका कोई लाभ नहीं मिल रहा है दो किस्तों में रकम मिल रही है।
दुबौलिया ब्लॉक के ग्राम चकोही के किसान कहते हैं कि मिल बंद होने से किसानों की कमर टूट गई। मिल बंद होने से किसानों की तरक्की के रास्ते बंद हो गए। इसी ब्लॉक के ग्राम सेमरा के किसान लल्लू सिंह ने बताया कि किसानों के मुख्य आय का स्रोत गन्ना की खेती ही था, इसी के सहारे किसान अपने बच्चों को पढ़ा लिखाकर उसे किसी काबिल बनाता था। मिल बंद होने से किसानों की खुशहाली समाप्त हो गई है।
हर्रैया नारायनपुर निवासी राज कुमार की गिनती क्षेत्र के बड़े गन्ना काश्तकार के रूप में है। मगर पिछले चार पांच वर्षों से वह गन्ने की बुआई कम रहे है। इसके पीछे कई कारण गिनाते है कहा कि मौसम की मार व फसल में बढ़ते रोग तो है ही साथ ही समय से भुगतान की समस्या से हर साल परेशानी उठानी पड़ती है।
रुधौली क्षेत्र के कुसौना निवासी चन्द्रप्रताप सिहं का कहना है कि पहले लगभग दो हेक्टेयर में गन्ने की खेती करते थे। किन्तु पिछले पांच वर्षों से गन्ने की बुआई बन्द कर दी क्यों कि चीनी मिल में घटतौली, समय से गन्ना मूल्य का भुगतान नही मिल पाने, गन्ने की छिलाई, लदाई में दो हजार रुपए प्रति ट्राली खर्च करना पड़ता है। भितेहरा के किसान गौरीशंकर चौधरी कहते हैं कि घटतौली, भुगतान में देरी, जंगली जानवरों नीलगाय, सूअर और शाही आदि भी नुकसान पंहुचा रहे है।
सोनहा गांव के निवासी व गन्ना किसान देवेन्द्र कुमार का कहना है कि चीनी मिल ने भुगतान करने में काफी समय लगाती है जिससे किसान गन्ना कि बुवाई कम कर दिया है।
सल्टौआ के पचानू गांव के चंद्रप्रकाश शुक्ला ने बताया कि दस बीघे में गन्ने की खेती करना शुरू किया था आर्थिक स्थिति ठीक हुई थी। अब समय से पैसा नही मिल पाता जिससे गन्ने की खेती करना बंद कर दिए है।
बांसापार गांव निवासी अविनाश ने बताया 40 बीघे में गन्ने की खेती किया जाता था ,मिल चालू होने से लेकर बंद होने तक सप्लाई किया जाता था और समय से मिल से भुगतान भी मिल जाया करता था। जिससे आर्थिक रूप से मजबूती मिल थी। अब तो समय से गन्ने का पैसा न मिलने से धीरे धीरे कमर टूट रही है।