समीक्षा खुद की। प्रतीक्षा ईश्वर के कृपा की। इच्छा परमात्मा के पुत्र रूपी आत्मा से सुसज्जित हरेक प्राणी की सेवा करने की हो तो जीव समस्त सुखों धन यश कीर्ति को प्राप्त करते हुए मोक्ष की प्राप्ति करता है। ये बातें श्रीधाम वृंदावन से पधारे स्वामी निधिकान्त गोपाल दास शास्त्री जी ने कहा। वे बखड़ौरा दुर्गा मन्दिर पर आयोजित श्री शतचण्डी महायज्ञ में कथा के तीसरे दिन श्रीराम कथा की अमृत वर्षा कर रहे थे। कथा व्यास ने कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम और भोलेनाथ एक दूसरे को प्रणाम कर समाज को संस्कार सूत्र में पिरोते हैं। किंतु आदिशक्ति माता भगवती सती भ्रमित हो जाती हैं, जिस शिव को संसार प्रणाम करता है वे एक दर दर भटकते एक वनवासी को क्यों प्रणाम करते हैं। सती माता सीता का रूप धारण कर प्रभु श्रीराम की परीक्षा लेती हैं। भोलेनाथ द्वारा माता प्रणाम कहने पर शर्मिंदा होकर सती जी वापस लौटती हैं। भगवान शिव सती का परित्याग करते हैं। भगवान शिव क्रुद्ध होकर समाधि में लीन हो जाते है। राजा हिमांचल के यहां सती माता पार्वती के रूप में जन्म लेती हैं और नारद मुनि की प्रेरणा से भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या करती हैं। जगत के कल्याण के लिए भगवान शिव विवाह के लिए तैयार हो जाते हैं। भगवान शिव की बारात एवं शिव का स्वरूप देख जहां राजा हिमांचल की पत्नी मैनावती दुखी हो जाती हैं वही उपस्थित श्रोता हंस हंस कर लोटपोट हो जाते हैं।
इस मौके पर महंत मनीराम दास, सन्तराम, राम वचन, उदयराज, मिठाई लाल, राम प्रकाश, सत्य प्रकाश, जुग्गीलाल, रामरेखा प्रजापति, अंगूर चौधरी, धर्मवीर, विनोद कुमार, राम लौट, सुमन, गायत्री, प्रिया सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।