बस्ती। सहालग शुरू होते ही बाजार में रौनक तो लौटी है, लेकिन ज्यादातर परिवारों के चेहरों पर चिंता की लकीरें भी दिख रही हैं। वजह, महंगाई ने शादी का पूरा बजट बिगाड़ दिया है। अब शादी की तैयारियों के साथ लोन की फाइलों की संख्या भी बढ़ रही हैं। जमीनें गिरवी रखी जा रही हैं या जमीन बेचने का वादा करके कर्ज लिया जा रहा है।
इन सबके बीच सहालग की चमक भले कायम हो, लेकिन अब ये खुशियां धीरे-धीरे कर्ज की परछाई में ढलती दिख रही हैं। ग्रामीण इलाकों की स्थिति और भी चिंताजनक है। गांवों में नकदी की कमी और बढ़ते खर्च के कारण कई परिवार जमीन या गहने गिरवी रखकर शादी में खर्च का इंतजाम कर रहे हैं। स्थानीय साहूकारों और सोने की दुकानों पर गोल्ड लोन की मांग तेजी से बढ़ी है। कई दुकानदार खुद उधारी में सामान दे रहे हैं, ताकि कारोबार भी चलता रहे और ग्राहक भी न खोएं।
बस्ती के बैंकों में इन दिनों शादी के लिए पर्सनल लोन और गोल्ड लोन के आवेदन तेजी से बढ़े हैं। पंजाब नेशनल बैंक के एक अधिकारी बताते हैं कि पिछले साल की तुलना में इस बार 20 प्रतिशत ज्यादा आवेदन आए हैं। सूत्र बताते हैं कि एक शाखा में प्रतिदिन पांच से छह आवेदन पड़ रहे हैं। अधिकतर लोग शादी के खर्च के लिए ही लोन ले रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के एजेंटों की पूछ बढ़ी है, जो आसान किस्तों में कर्ज दे रहे हैं।
शहर के टेंट और हलवाई कारोबारी भी उधारी के बढ़ते चलन को मानते हैं। टेंट कारोबारी संतोष कुमार सिंह कहते हैं पहले 70 फीसदी लोग एडवांस देते थे, अब आधे लोग शादी के बाद भुगतान करने की बात करते हैं। कहते हैं कि बाकी सब निपट जाए तब हिसाब करेंगे।
महंगाई ने हर स्तर पर खर्च बढ़ा दिया है। कपड़ा और कॉस्मेटिक से लेकर ज्वेलरी, डीजे और कैटरिंग तक सब 30 से 40 फीसदी महंगे हो चुके हैं। औसत ग्रामीण शादी का खर्च अब 4 से 6 लाख रुपये तक पहुंच गया है। ऐसे में मध्यमवर्गीय परिवारों पर बोझ बढ़ा है।
समाजशास्त्री डॉ. रघुवर पांडेय का कहना है, शादी अब सामाजिक जिम्मेदारी से ज्यादा प्रतिष्ठा का प्रदर्शन बन गई है। परिवार अपनी औकात से ज्यादा खर्च इसलिए करते हैं ताकि समाज में नाम बना रहे। यही मानसिकता उन्हें कर्ज के जाल में फंसा रही है।
दूसरी ओर कुछ परिवार सादगी का रास्ता अपना रहे हैं। दुबौलिया के रहने वाले रामशरण ने बेटे की शादी मंदिर परिसर में की। बोले,पैसे की बर्बादी से बेहतर है, बच्चों के भविष्य में लगाएं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि शादी का यह मौसमी दबाव ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर डालता है। नकद प्रवाह घटता है, लोग कर्ज में जाते हैं और आने वाले महीनों में यही कर्ज स्थानीय खर्चों को सीमित कर देता है।