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सरकारी आवास: छत के नीचे जोखिम में जिंदगी

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जर्जर दीवार। - फोटो : amar ujala
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           बस्ती। जिन सरकारी भवनों की छत के नीचे कर्मचारी और उनका परिवार रहता है, वहां 24 घंटे खतरा नजर आता है। क्योंकि 25 वर्ष पुराना यह भवन पूरी तरह जर्जर है। दीवारें दरक गई हैं और छत इतनी जर्जर है कि एक घंटे की बारिश में दिन भर कमरे में पानी टपकता है। 
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अंबेडकर छात्रावास के निकट स्थित सरकारी आवास में कुल छह ब्लॉक हैं। प्रत्येक ब्लॉक में एक-दो रूम सेट नीचे और इतने ही कमरे ऊपर हैं। यानी छह ब्लॉकों में चौबीस रूम सेट हैं, जहां सरकारी कर्मी और उनका परिवार रहता है। इस भवन के रखरखाव की जिम्मेदारी लोक निर्माण विभाग की है, मगर इसकी मरम्मत के नाम पर मिले सरकारी धन का कहीं पता नहीं चलता। क्योंकि यदि कोई निर्माण कार्य कराना होता है तो कर्मी अपने पास से ही उसे कराता है, जिसके एवज में लोक निर्माण विभाग उन्हें कोई भुगतान नहीं देता। चूंकि इस भवन के निर्माण में ही गुुणवत्ता की अनदेखी कर दी गई इस नाते 25 वर्ष में ही यह जर्जर हो गया है। दीवारों से कई जगह सीमेंट पूरी तरह झड़ गया है। यही नहीं जर्जर दीवारों पर कई पेड़ भी उग गए हैं, जिससे वह फट गई है। आवास के छज्जे भी दरकने लगे हैं। पिछले 24 जून को यहां बड़ा हादसा हुआ जब कलेक्ट्रेट कर्मी पंकज पांडेय किसी कार्यक्रम से लौटा और गर्मी अधिक होने के कारण वह अपने कमरे के दूसरी मंजिल पर छज्जे की दीवार से सट कर खड़ा था कि अचानक दीवार ढह गई और वह नीचे झाड़-झंखाड़ के बीच आ गिरा। उसके सिर और शरीर के विभिन्न हिस्सों में खासी चोटें आईं। इस दुर्घटना के बाद उसे अस्पताल पहुंचाया गया, जहां उसे लखनऊ रेफर कर दिया गया। बाद में लखनऊ ने उसे दिल्ली एम्स में रेफर किया, जहां वह जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहा है। इसी सरकारी भवन में निवास करने वाले सरकारी कर्मी के पुत्र अंकुर यादव कहते हैं कि यहां कमरे की दीवारें व छत जर्जर हो चुकी हैं। दिन तो दिन रात भी भय के साए में कटती है। मरम्मत के नाम पर आज तक एक पाई का काम भी यहां नहीं हुआ है। चारों ओर गंदगी और झाड़-झंखाड़ से सांप-बिच्छू का भी भय रहता है। कर्मचारी नेता राम अधार पाल कहते हैं कि इस भवन के संबंध में कई बार शिकायत दर्ज कराई गई, मगर कोई सुनने वाला नहीं है। नवागत डीएम को भी पत्र दिया जा चुका है। आरोप लगाते हैं कि मरम्मत के धन का उपयोग या तो अधिकारियों के भवनों की साज सज्जा में खर्च होता है अथवा उसकी बंदरबांट कर ली जाती है। यहां रहने वाली विद्यावती कहती हैं कि सरकारी आवास में तो जान जोखिम में डालकर परिवार रहता है। कभी यहां कोई अधिकारी झांकने तक नहीं आता कि कर्मचारी किन हालात में रहते हैं। भवन जर्जर है। कभी भी यह गिर सकता है, मगर इसकी मरम्मत कराने की जहमत कोई नहीं उठा रहा है। एक अन्य कर्मी के परिवार की मीरा श्रीवास्तव कहती हैं कि सरकारी आवास के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई गई है। इससे बेहतर तो छप्पर में रहना है। क्योंकि यहां पानी बरसने पर घर में भी प्लास्टिक लगाकर सामान को सुरक्षित करना पड़ता है। बारिश का पानी छतों से दिन भर टपकता है। यही नहीं दीवारों की सीलन भी सामान को खराब कर देती है।
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