लगातार बढ़ रहे घाघरा के जलस्तर की रफ्तार में शुक्रवार को कमी आई है। सुबहआठ बजे केंद्रीय जल आयोग अयोध्या कार्यालय के मुताबिक जलस्तर खतरे के निशान से 30 सेमी बढ़कर 93:056 था। जो शाम तक स्थिर रहा।
विक्रमजोत प्रतिनिधि के मुताबिक गौरियानैन में तटबंधों पर बाढ़ विभाग के अधिकारी जेई जेपी जायसवाल, दयाशंकर सिंह के अलावा एसडीएम हरैया हरीश्चन्द्र सिंह, सीओ कृष्ण मुरारी, कानूनगो और लेखपाल भी लगातार निरीक्षण कर रहे हैं। बंधे पर बने रेग्युलेटरों से उसके बगल के गांव कल्याणपुर, बाघानाला, भरथापुर, सीतारामपुर, छतौना से होकर हाइवे की तरफ पानी रुख कर चुका है। केशवपुर, मुंडेरीपुर, खतमसराय, भदोई, मुनियावा, फूलडीह, पठखापुर सहित कई गांवों के खेतों में पानी पहुंच गया है जिससे सबसे बड़ा संकट चारे का हो गया है। चूंकि पशुओं के चारा स्थल माझा में पानी पहले ही भर गया है। धान और सब्जी की खेती भी प्रभावित हो रही है। जहां बड़ी संख्या में ग्रामीण दुग्ध व्यवसाय में पशुपालक है। हरे चारे और चरागाह सब बाढ़ के पानी डूब जा रहा है। नदी की धारा चार किमी. चौडी पट्टीवाली हो गई। सरयू बंधे व ठोकरों पर रुक, रुक कर कटान से गांव वाले भी दहशत में हैं। गौरियानयन के ग्राम प्रधान ईश्वर दीन मौर्य का कहना है कि हर साल की तरह सरयू का तबाही मचाना तय है अबकी बार तो कटान अभी से शुरू है और बाढ विभाग की बचाव की सारी कोशिशें नाकाम होती जा रही हैं। अभी तक डॉक्टरों की टीम नहीं दिखाई दी है जबकि कई लोगों के पालतू पशु बीमार हो गए हैं। टीकाकरण भी नहीं कराया गया है। जबकि बंधे पर रोज अधिकारी आते रहते हैं मगर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। रामलगन यादव, पप्पू पाल, बाबूलाल यादव ने बीमार पशुओं को दिखाकर कहा कि माझा क्षेत्र के डूब जाने से मवेशियों के लिए चारा संकट बढ़ गया है।छावनी प्रतिनिधि के मुताबिक विक्रमजोत -लोलपुर बांध के तटवर्ती गांवों के लोगों का कहना है कि घाघरा नदी की बाढ़ और कटान से नींदे गायब हो गई हैं। हर वर्ष बरसात के चार माह खानाबदोश जिंदगी जीने को मजबूर रहते हैं। साल भर की मेहनत की कमाई बरसात के चार माह के लिए कम पड़ जाती है।ग्रामीणों का कहना है कि वर्तमान कमाई माझा में की गई खेती नदी की उफनती धारा में समा गई। पशुओं के चारे तक का संकट खड़ा हो गया है। नदी का दबाव सीधे बांध होने के कारण भविष्य भी लुटता सामने दिखाई पड़ रहा है। नदी बांध से एकदम सट कर बह रही है। बांध बचाव के लिए बनाए गए ठोकर नदी में बैठ जा रहे हैं। घर परिवार की चिंता सताती रहती है। हालत यह है कि परिवार के कुछ लोग सोते हैं तो कुछ जागते रहते हैं।
समय से नहीं मिला धन
हर्रैया। समय से धन मिला होता तो शायद गौरियानैन सहित दर्जनों गांवों पर मंडरा रहा खतरा नहीं होता। 2013-14 में स्वीकृति मिलने के बाद करीब दस किमी लंबा लोलपुर विक्रमजोत बांध का अधिकांश भाग अभी भी अधूरा है। केवल 1500 मीटर ही नदी पर बांध का निर्माण हुआ है। एक्सईएन राजीव कुमार सिंह ने बताया कि 12 करोड़ का प्रपोजल स्वीकृत है जिसका टेंडर भी हुआ है मगर शासन से धन नही मिलने से कार्य नहीं हो पा रहा है।जो भी कार्य कराया गया उसका भुगतान भी नहीं हुआ है। कहाकि घाघरा नदी में बांध को कटने बचाने के लिए 30 वर्गमीटर का पत्थर का सेक्सन बनाने की आवश्यकता है तभी कटान रोकी जा सकेगी।