जीआईसी में 500 के भीतर सिमट गई छात्रसंख्या, सप्ताह भर में महज छह बच्चों का हुआ नामांकन
अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षक नहीं, विद्यार्थियों का मोहभंग
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। राजकीय माध्यमिक विद्यालयों की साख दिन-ब-दिन घटती ही जा रही है। इनसे विद्यार्थियों का मोहभंग हो गया है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो गया है। मगर, इन विद्यालयों में नामांकन के लिए बच्चों की आवक न के बराबर है। मुख्यालय स्थित सबसे प्रतिष्ठित विद्यालय जीआईसी में एक सप्ताह के भीतर महज छह बच्चों का नामांकन हुआ है। ग्रामीण अंचल के राजकीय विद्यालयों की स्थिति और खराब है। इसकी मुख्य वजह इन विद्यालयों में लंबे समय से अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे महत्वपूर्ण विषयों के शिक्षकों का न होना है। इससे विद्यार्थी अपने भविष्य को संवारने के लिए निजी विद्यालयों की ओर रुख कर रहे हैं।
निजी विद्यालयों में महंगी फीस होने के बावजूद नामांकन के लिए विद्यार्थियों का तांता लगा हुआ है। अभिभावक अपने बच्चों के साथ निजी विद्यालयों में पहुंच रहे हैं। कुछ निजी स्कूलों में प्रवेश परीक्षा तक कराई जा रही है। दूसरी ओर राजकीय माध्यमिक विद्यालयों में बच्चों के लाले पड़े हैं। यहां नामांकन जैसा कोई माहौल नहीं है। अधिकतर राजकीय विद्यालयों में सन्नाटा पसरा हुआ है। यहां न अभिभावक पहुंच रहे हैं और न ही विद्यार्थी।
जिले में 24 राजकीय विद्यालय संचालित किए जा रहे हैं। इसमें सात इंटरमीडिएट व 16 विद्यालय हाईस्कूल स्तर के हैं। इन विद्यालयों में शिक्षकों की कमी बरकरार है। सहायक अध्यापक के 199 पद के सापेक्ष 120 कार्यरत है। 79 पद रिक्त चल रहे हैं। जबकि प्रवक्ता के 79 पद के सापेक्ष महज 26 शिक्षक कार्यरत हैं। 54 प्रवक्ता के पद रिक्त चल रहे हैं। शिक्षकों की कमी की वजह से यह विद्यालय निजी स्कूलों से प्रतिस्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं। विद्यालय के प्रधानाचार्य डॉ. विजय प्रकाश वर्मा ने कहा कि पिछले दिनों शासन से रिक्त शिक्षकों की रिपोर्ट मांगी गई थी, जिसे भेज दी गई है। अभिभावक-शिक्षक संघ के तहत शिक्षकों की वैकल्पिक व्यवस्था की जाती है। मगर भौतिक एवं रसायन विज्ञान के शिक्षक नहीं मिल रहे हैं।
विद्यालय के पुरातन छात्र विनोद कुमार शुक्ल कहते हैं कि कभी जीआईसी में दाखिला के लिए सोर्स लगानी पड़ती थी। तब भी नामांकन नहीं होता था। जीआईसी को मेधावियों की नर्सरी कहा जाता रहा। वर्तमान में इस विद्यालय की स्थिति को देखकर मन दुखी होता है।
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113 वर्ष पुराने जीआईसी में कभी नामांकन था कठिन
जिले के सबसे पुरातन 113 वर्ष की आयु वाले राजकीय इंटर कॉलेज की दशा दो दशक के भीतर दयनीय होती गई। लगभग 100 एकड़ भू-भाग में बसे इस स्कूल की ख्याति कभी दूर- दूर तक फैली थी। वर्तमान में यहां न शिक्षक रह गए और न विद्यार्थी। 23 साल से यहां भौतिक विज्ञान के प्रवक्ता का पद रिक्त चल रहा है। इसके अलावा हिंदी, इतिहास, रसायन विज्ञान, गणित, जीव विज्ञान एवं अर्थशास्त्र के शिक्षक भी नहीं है। यहां वर्ष 2000 के पहले तक प्रत्येक क्लास में तीन वर्ग संचालित किए जा रहे थे। 6 से 12 तक की कक्षाओं में 1500 से 2000 विद्यार्थियों का नामांकन होता रहा। अब स्थिति उलट गई है। कक्षाओं में अंगुली पर गिनी जीने वाली संख्या भी कभी-कभी नहीं दिखती है। यहां पंजीकृत विद्यार्थियों की संख्या 459 पर आकर सिमट गई है। 113 साल पुराने इस विद्यालय के भवन की दशा भी दयनीय हो गई है। कमरों के छतों में झरोखे हैं। दीवारों के प्लास्टर उखड़कर गिर रहे हैं। सुरक्षा की दृष्टि से कई कमरों में पढ़ाई होने लायक नहीं है।
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जीजीआईसी में भी शिक्षकों की कमी
जीजीआईसी में प्रवक्ता के 15 पद में छह पद खाली हैं। इसमें रसायन विज्ञान, गणित, इतिहास, भूगोल, समाजशास्त्र और अंग्रेजी विषय के शिक्षक नहीं है। जबकि सहायक अध्यापक के 15 में से 11 पद खाली है। हालांकि यहां छात्राओं की संख्या संतोषजनक 1212 बताई जा रही है। इस नए सत्र में 30 छात्राओं का दाखिला अब तक लिया है।
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कोट
शिक्षकों के रिक्त पदों का विवरण शासन को भेजा गया है। दूसरे मुख्यालय पर स्थित जीआईसी का उच्चीकरण शीघ्र होने वाला है। प्रोजेक्ट अलंकार के तहत शासन से 4.90 करोड़ का बजट स्वीकृति हुआ है। पहली किस्त आ चुकी है। इससे विद्यालय भवन के छत मरम्मत और प्लास्टर का कार्य शुरू कराया जाएगा।
-जगदीश प्रसाद शुक्ल, डीआईओएस