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Basti News: नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म पर फांसी,बालिग से सजा 20 वर्ष

Tue, 09 Jul 2024 02:15 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
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पूर्व आईपीएस अधिकारी व वरिष्ठ अधिवक्ता ने बताई बारीकियां
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संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। भारतीय न्याय संहिता में नाबालिग से सामूहिक दुष्कर्म का आरोप सिद्ध होने पर फांसी की सजा दी जा सकती है। जबकि वही घटना अगर बालिग के साथ हो तो 20 वर्ष की कठोर कारावास की सजा हो सकती है। आईपीसी में यह धारा 376 डी के तहत आता था। सामूहिक दुष्कर्म में बालिग पीड़िता के मामले में सजा पूर्ववत ही है। मगर, नाबालिग पीड़िता से सामूहिक दुष्कर्म उपधारा 70 (2) में आएगा। इसमें आजीवन कारावास के साथ ही वैकल्पिक दंड के रूप में मृत्यु दंड भी रखा गया है। जबकि यह पहले केवल 12 वर्ष से कम आयु की पीड़िता के मामले में ही होता था।
वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश प्रताप सिंह बताते हैं कि नए कानून में नाबालिग के साथ दुष्कर्म करने वाले दोषियों को फांसी की सजा दी जा सकेगी। नाबालिग के साथ गैंगरेप को नये अपराध की श्रेणी में रखा गया है। नये कानून में मॉब लिंचिंग के दोषियों को भी सजा दिलाने का प्रावधान किया गया है। इसमें कहा गया है कि जब पांच या उससे ज्यादा लोग जाति या समुदाय के आधार पर किसी की हत्या करते हैं, तो उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिलेगी।
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सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी लक्ष्मी नारायण बताते हैं कि मॉब लिचिंग में शामिल व्यक्ति को दोषी पाए जाने पर उम्रकैद या मौत की सजा के साथ-साथ जुर्माना की सजा मिल सकती है। 163 साल पुराने आईपीसी की जगह सेक्शन चार की तरह सजा के तौर पर दोषी को सामाजिक सेवा करनी पड़ेगी। अगर किसी ने शादी का धोखा देकर यौन संबंध बनाया तो उसे 10 साल की सजा और जुर्माना हो सकता है।
इसके अलावा नौकरी या अपनी पहचान छिपाकर शादी के लिए धोखा देने पर भी सजा का प्रावधान किया गया है। अब संगठित अपराध जैसे अपहरण, डकैती, गाड़ी की चोरी, कॉन्ट्रैक्ट किलिंग, आर्थिक अपराध, साइबर क्राइम के लिए कड़ी सजा दी जायेगी। राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कामों पर भी सजा का प्रावधान किया गया है।
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बंदियों की जमानत में भी बदला नियम
नए कानून में एक अहम प्रावधान विचाराधीन बंदियोंं के लिए है। अगर किसी को पहली बार अपराधी माना गय, तो वह अपने अपराध की अधिकतम सजा का एक तिहाई पूरा करने के बाद जमानत हासिल कर सकता है। इसकी वजह से विचाराधीन बंदियों के लिए तुरंत जमानत पाना मुश्किल हो गया है। हालांकि, यह आजीवन कारावास की सजा वाले अपराधों को अंजाम देने वाले आरोपियों पर लागू नहीं होता है।
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इलेक्ट्राॅनिक सबूत का देना होगा ब्योरा
सेवानिवृत्त आईपीएस लक्ष्मी नारायण बताते हैं कि बीएनएसएस में कम से कम सात साल की कैद की सजा वाले अपराधों के लिए फोरेंसिक जांच अब अनिवार्य हो जायेगी। फोरेंसिक एक्सपर्ट्स को अपराध वाली जगह से सबूतों को इकट्ठा और रिकॉर्ड करना होगा। अगर किसी राज्य में फोरेंसिक सुविधा का अभाव है, तो वह दूसरे राज्य में इस सुविधा का इस्तेमाल कर सकता है। नए कानून में न्यायालयों की व्यवस्था का भी जिक्र किया गया है। अभी तक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स की जानकारी एफिडेविट तक सीमित होती थी, लेकिन अब उसके बारे में विस्तृत जानकारी कोर्ट को देनी होगी। आसान भाषा में कहें तो कोर्ट को बताना होगा कि इलेक्ट्रॉनिक सबूत में क्या-क्या शामिल है।
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