बस्ती। खून के काले धंधे से जुड़े बड़े लोग अब मामले का रुख मोड़ने की कोशिश में जुट गए हैं। पहले से ही मामले को दबाने में लगी पुलिस का रवैया अब भी नहीं बदला है। विवेचक मानने को तैयार नहीं है कि प्रभाकर शातिर है।
पुरानी बस्ती के थानाप्रभारी सर्वेश राय का कहना है कि विवेचना की गोपनीयता के कारण कई बातें नहीं बताई जा सकतीं। जबकि कानून के जानकारों के अनुसार यह दलील उचित नहीं है। इसकी वजह यह है कि जिन धाराओं में मुकदमा दर्ज कर दोनों को पुलिस ने जेल भेजा है, उसमें बिना अभिलेखीय साक्ष्य के अदालत रिमांड ही स्वीकार नहीं करती। जाहिर है कि पुलिस बताने से ज्यादा छिपाने में ताकत झोंके हुए है। जिस नर्सिंग होम या डाक्टर की कॉल आने पर प्रभाकर खून पहुंचाता था, उस डाक्टर और हास्पिटल का नाम बताने से पुलिस अब भी बच रही है। हालांकि डीएम डा. राजशेखर की गठित मजिस्ट्रियल जांच टीम के सदस्य/सीएमओ डा. जेएलएम कुशवाहा का कहना है कि मामले की पारदर्शी जांच की जाएगी। खून का अवैध धंधा करने और संरक्षण देने वालों को भी सामने लाया जाएगा।
पुलिस की नजर में अनाड़ी है प्रभाकर
पुलिस प्रभाकर को अनाड़ी बता रही है। कहा जा रहा है कि उसे यह नहीं पता था कि जो कर रहा है वह अवैध है। जबकि उसकी करतूत से समूचा पूर्वांचल दंग है। उसे जानने वाले बताते हैं कि कुछ बड़े लोगों के उकसाने पर वह बड़हलगंज के ब्लड बैंक से नौकरी छोड़कर बस्ती के महरीखावां आया। उन्हीं लोगों ने उसे किराए का कमरा दिलवाकर उसकी मेडिकल क्षेत्र में तगड़ी पहचान का फायदा उठाया और खून निकलवा कर बेचने लगे। जब भी इस धंधे के खिलाफ आवाज उठी तो जांच को गुमराह कर दिया गया।
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रक्त का बैग रहस्य बना
खून रखने वाला बैग आमतौर पर प्रतिबंधित है। इसे सिर्फ उन्हीं ब्लड बैंक को दिया जाता है जिनका पंजीकरण है। जाहिर है कि प्रभाकर जिस बैग का इस्तेमाल करता था वह कहीं न कहीं उसी व्यवस्था से जुड़ा व्यक्ति मुहैया कराता रहा होगा। पुलिस उसकी भी खोज में जुटी है।
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पूछताछ से आजिज आया परिवार
संजय कालोनी निवासी प्रदीप का परिवार पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और मीडिया के सवालों का जवाब देते आजिज आ गया है। बुधवार को उसके घर अमर उजाला टीम पहुंची तो परिवार का कोई सदस्य बात करने तक को तैयार नहीं हुआ। फोटो खींचने पर मनाही कर दी। सिर्फ इतना बताया कि प्रदीप भूसा लेने मुंडेरवा गया है। आने में देर होगी।