बस्ती। नक्सली हमले में 74 सीआरपीएफ जवानों के शहीद होने के मामले की छानबीन में कारतूस घोटाले का ऐसा मामला उजागर हुआ था, जिसने पुलिस महकमे में खलबली मचा दिया था। यूपी एसटीएफ ने प्रयागराज के रिटायर्ड दरोगा यशोदानंदन को गिरफ्तार कर उसके पास से एक लाल डायरी बरामद की थी।
उस डायरी में दर्ज ब्योरे के आधार पर 29 और 30 अप्रैल 2010 काे बस्ती पुलिस लाइंस के आर्मोरर राम कृपाल सिंह समेत छह पुलिस कर्मियों की एसटीएफ ने गिरफ्तारी तो की लेकिन न्यायालय में उनके खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं जुटा पाई। जिसका नतीजा यह हुआ कि मामला कमजोर होता चला गया और मात्र रामकृपाल सिंह को ही सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा हो पाई।
केस में नामजद अयोध्या (तत्समय फैजाबाद) पुलिस के आर्मोरर जितेंद्र सिंह और अमर सिंह, गोरखपुर पुलिस का आर्मोरर राजेश शाही, राजेश सिंह और 30वीं वाहिनी प्रांतीय सशस्त्र बल(पीएसी) गोंडा का आर्मोरर सुशील कुमार मिश्रा को अदालत ने पर्याप्त सबूत के अभाव में बरी कर दिया।
अक्तूबर वर्ष 2010 में हुए उक्त नक्सली हमले के बाद मौके से प्रतिबंधित 303 बोर के कारतूस बरामद किए गए थे। जिसके बाद खलबली मच गई कि पुलिस की आर्मरी में सप्लाई होने वाले कारतूस नक्सलियों तक कैसे पहुंचे। एसटीएफ ने मामले की जांच शुरू की तो पता चला कि राज्य के विभिन्न जिलों के आर्मोरर नक्सलियों को अवैध कारतूस सप्लाई कर रहे हैं।
जांच टीम ने बस्ती पुलिस लाइंस में तैनात आर्मोरर रामकृपाल सिंह को गिरफ्तार कर उसके ब्रीफकेस से विभिन्न प्रकार के कारतूस और खोखे बरामद किए थे। न्यायालय ने सभी पक्षों का बयान और सुबूत के आधार पर राम कृपाल को सजा सुना दी। बाकी सभी आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया।