ब्रिटिश कालीन कानून से महामारी पर शिकंजा
बस्ती। कोरोना जैसी वैश्विक माहमारी से पुलिस ब्रिटिश कालीन कानून के जरिए लड़ाई लड़ रही है। दरअसल, लॉकडाउन का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ महामारी रोग अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा रही है। यह अधिनियम 123 साल पहले वर्ष-1897 में बना था। कोरोना वायरस संक्रमण को लेकर हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं। शहर में दुकान पर खरीदारी प्रतिबंधित कर होम डिलीवरी शुरू की गई। इसके बावजूद लोग मानने को तैयार नहीं हैं। बेवजह घरों से निकल रहे हैं। कई स्थानों पर दुकानें खुल रही हैं। जिंदगी महफूज रखने के लिए ऐसे लोगों के खिलाफ रोजाना मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। महामारी अधिनियम 1897 सरकार को असीमित अधिकार देता है। आईजी आशुतोष कुमार के अनुसार अधिनियम के अनुसार प्रशासन से जारी आदेश की अवज्ञा करने पर धारा 188 के तहत मुकदमा दर्ज होता है। इसमें एक माह के साधारण कारावास या 200 रुपये तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। ये अवज्ञा मानव जीवन, स्वास्थ्य, सुरक्षा के लिए खतरा या दंगे का कारण बनती है, तब सजा छह महीने के कारावास या 1000 रुपये जुर्माना या दोनों हो सकती है। जान बूझकर लोगों में संक्रमण फैलाने की स्थिति में पुलिस इस नियम के तहत मिले असीमित अधिकारों का प्रयोग कर आरोपित के खिलाफ धारा 307 यानी हत्या के प्रयास का भी मुकदमा दर्ज कर सकती है। इसमें उम्रकैद तक का प्रावधान है।
अधिनियम में नियम
लॉकडाउन के नियम तोड़ने वालों के खिलाफ आपदा प्रबंधन एक्ट 2005 के तहत कार्रवाई की जाती है। आपदा प्रबंधन एक्ट की धारा 2 (डी) में आपदा का अर्थ किसी क्षेत्र में प्राकृतिक या मानव जनित कारण या उपेक्षा से पनपने वाली महाविपत्ति है। कोरोना वायरस को महामारी वर्ग में शामिल करते हुए इस धारा का प्रयोग किया जा रहा है। इस एक्ट में आपदा से निपटने के लिए 51 से 60 तक 10 प्रमुख धाराएं हैं।
क्या है पूरा प्राविधान
अधिवक्ता अवधेश प्रताप सिंह का कहना है कि सरकारी कर्मचारी को आपदा के दौरान उसके कर्तव्य पूरा करने से रोकना, बाधा डालना, सरकार के निर्देशों को मानने से इंकार करना इस दायरे में आता है। इसके अलावा सरकारी ड्यूटी पर रहते हुए लापरवाही, गलत तथ्य लोगों में फैलाना, दहशत पैदा करना आदि इस अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा सकती है।