बस्ती। जिला महिला चिकित्सालय प्रशासनिक प्रयास के बाद भी दलालों के चंगुल से उबर नहीं पा रहा है। यहां आने वाली प्रसूताओं के साथ हर रोज धोखा हो रहा है। उनके अस्पताल में पहुंचते ही महिला दलाल उन्हें घेर लेती हैं। पहले प्रसव पीड़ा से कराहती मरीज के सहयोग का बहाना बनाती है और फिर उनके आगे-पीछे चलने लगती हैं। इन दलालों को बस उस मौके की तलाश होती है कि लेबर रूम के स्टाफ कब यह कह दें कि डिलीवरी का केस अस्पताल में संभलने योग्य नहीं है। चार-छह मरीजों की आमद पर दो-तीन प्रसूताओं को इस तरह का जवाब मिलना यहां की परंपरा है। डिलीवरी का केस जटिल बताए जाने पर तीमारदार घबरा जाते हैं। इसी बीच उनके ईद-गिर्द मौजूद महिला दलाल निजी अस्पताल में ले जाने का सुझाव पेश करती हैं। बात बन गई तो खुद साथ जाकर मरीज और उनके तीमारदारों को सांठगांठ वाले निजी अस्पताल में शिफ्ट करा देती है। फिर क्या सीरियस मामला बताकर संबंधित मरीज के इलाज में मोटी रकम परिजनों से वसूल कर ली जाती है।
शहरी क्षेत्र में दलालों के भरोसे संचालित इस तरह के एक दर्जन से अधिक निजी अस्पताल हैं। जिनके पास चिकित्सीय अनुभव न के बराबर है। पैरामेडिकल स्टाफ भी डिग्रीधारक नहीं हैं। दिखाने के लिए एक अनुभवी नर्स का ही इंतजाम रहता है। इसके अलावा जरूरत पड़ने पर चिकित्सक बाहर से बुलाए जाते हैं। अल्ट्रासाउंड, खून जांच, सूई, मरहम, पट्टी आदि जरूरी कार्य अप्रशिक्षित लोगों के जिम्मे रहता है। इन अस्पतालों का संजाल आशा बहुओं तक फैला हुआ है। लगभग एक दर्जन आशा बहुएं इस पेशे में काफी दिनों से उतरी हुई है। जिनकी उपस्थिति महिला अस्पताल परिसर में किसी भी समय देखी जा सकती है। इन्हें मरीज को भ्रमित कर निजी अस्पतालों तक पहुंचाने पर वसूली का 50 प्रतिशत हिस्सा बतौर कमीशन मिलता है। इस खेल में अस्पताल में कार्यरत स्टाफ की भी भूमिका संदिग्ध रहती है। तभी मरीजों को सीरियस बताकर रेफर किया जाता है। वहीं मरीज जब महज तीन चार कमरे में संचालित मानक विहीन अस्पतालों में जाता है तो वहां डिलीवरी करा दिया जाता है। इसके बदले प्रति मरीज 30 से 40 हजार रुपये वसूल होता है।
इन स्थितियों में मरीज होते हैं रेफर
जिला महिला चिकित्सालय में पहुंचने वाले प्रसूताओं को भर्ती करने से पहले चिकित्सक या वहां मौजूद स्टाफ उनकी स्वास्थ्य से संबंधित प्रोफाइल चेक करते हैं। यदि जांच खून 8 प्रतिशत या उससे कम पाया तो तत्काल गंभीर बताकर हायर मेडिकल सेंटर पर ले जाने क सलाह दे दी जाती है। इसके अलावा मरीज को भर्ती न करने के अन्य तमाम बहाने भी हैं। उक्त रक्तचाप एवं हाई लेबल सुगर जैसी अन्य स्थितियों में भी मरीज को भर्ती नहीं किया जाता है। जानकार बताते हैं कि मरीज को भर्ती करने पर वह रिकार्ड में आ जाते हैं। इसीलिए जिम्मेदार मौखिक रूप से ही रेफर करते हैं। ताकि बाद में उनकी कोई जवाबदेही न हो। विवश तीमारदारों को जब कुछ नहीं सूझता है तो वे दलालों के झांसे में आ जाते हैं।
इस लोकेशन पर संचालित हो रहे निजी अस्पताल
गांधीनगर मालीटोला, मालवीय रोड ब्राह्मण महासभा,रोडवेज तिराहा, दक्षिण दरवाजा, रौतापार क्षेत्र में आधा दर्जन से अधिक निजी अस्पताल दलालों के भरोसे संचालित किए जा रहे हैं। जिनकी महिला अस्पताल से दूरी एक से दो किलोमीटर के बीच है। ताकि मरीजों को पहुंचाने में बहुत वक्त न लगे। इसके अलावा जामडीह, बड़ेवन,पटेल चौराहे के आसपास भी ऐसे अस्पतालों की भरमार है। स्वास्थ्य महकमा भी इन अस्पतालों पर कार्रवाई करने से कतराता है।
अस्पताल में दलालों के प्रवेश पर पूरी तरह प्रतिबंध है। इसीलिए कैमरा ऑन रखा जाता है। क्रिटिकल मरीजों को रेफर करना उसके हित में होता है। अब कोई बाहर जाकर दलालों के चंगुल में फंसे तो यह उसकी जिम्मेदारी है। यहां मेडिकल काॅलेज हैं। हमारे चिकित्सक वहीं ले जाने का सलाह देते हैं।
-सुधांधु द्विवेदी, सीएमएस, जिला महिला चिकित्सालय, बस्ती।
अबैध अस्पतालों के खिलाफ अक्सर अभियान चलाया जाता है। यदि दलालों के सहारे अस्पताल चलाने की बात है तो इसकी शिकायत मिलनी चाहिए। विभाग कार्रवाई करेगा। -आरपी मिश्र, मुख्य चिकित्साधिकारी, बस्ती।