संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। शहरी आवास योजना में करीब 98 गरीब सूचीबद्ध हैं। करीब दो साल से इन पात्रों के आवेदन इस मेज से उस मेज तक घूम रहे हैं, मगर अब तक आवास नहीं मिला है। पात्र को घर का इंतजार है, और यहां सात साल से 360 कांशीराम आवास बन कर तैयार और खाली हैं, मगर जरूरतमंदों को खुद का आशियाना नहीं मिल सका है। नतीजतन आवास के इंतजार में गरीबों की जिंदगी यहां वहां खानाबदोश जैसी कट रही है।
कांशीराम शहरी आवास के तहत 2011 में शहर से सटे डारीडीहा व छबिलहा में बहुमंजिली आवासों के कई पॉकेट (ब्लॉक) तैयार किए गए थे। इसमें पॉकेट एक में 898, पॉकेट दो व तीन में 360-360 गरीब परिवारों को रहने का इंतजाम किया गया है। करीब चार करोड़ की लागत से ऐसा ही एक पॉकेट छबिलहा गांव के पास निर्मित किया गया है। इसमें 360 गरीब परिवारों को छत मुहैया हो सकती है। अन्य पॉकेट के आवास तो गरीबों को आवंटित हो गए, लेकिन अभी तक इस पॉकेट के सभी आवास सूने पड़े हैं, जबकि 2015 में ही यह ब्लॉक हैंडओवर हो चुके हैं।
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केस नंबर एक
संजय कॉलोनी निवासी सलमा पत्नी अली हसन किराए के मकान में कई साल से रहती हैं। दो साल पहले इन्होंने कांशीराम आवास के लिए आवेदन किया। नगरीय विकास अभिकरण में कई बार आवास आवंटन के लिए सिफारिश की, मगर यहां सुनने वाला कोई नहीं। सलमा कहती हैं कि उनके पति किराए पर ऑटो चलाते हैं, जिससे परिवार का किसी तरह भरण पोषण हो पा रहा है। छत मिल जाती तो परिवार को यहां वहां भटकने की जरूरत नहीं पड़ती।
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केस नंबर दो
शहर के बैरिहवां में किराए के मकान में रहने वाली शबनम के पति रिक्शा चलाते हैं। चार बच्चों सहित छह परिवार का यह कुनबा दो साल से आवास के लिए दौड़ रहा है। एक बार तो आवेदन निरस्त हो चुका है, मगर दूसरी बार में पात्रता का हवाला देकर आवेदन किया है, मगर अब तक कोई पहल नहीं हो सका है कि उन्हें आवास मिल जाए। वह कहती हैं कि दूसरों के रहमो-करम पर यहां रहती हैं। गरीबी के चलते मकान मालिक कोई किराया नहीं लेते हैं। बेटियों को लेकर कहां जाएं।
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करीब 98 आवेदन मिले हैं, आवेदकों के पात्रता के सत्यापन के बाद जरूरतमंदों को आवास मिल जाएगा। यहां बिजली पानी का इंतजाम कराया जा रहा है। बिजली की लाइन खिंच गई है। पानी के लिए इंडिया मार्का हैंडपंप लगाने के लिए संबंधित विभाग से बातचीत हो गई है।
-दुर्गेश्वर त्रिपाठी, ईओ