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Basti News: बौर से लद गई अमराई, बागवानों को अच्छे उत्पादन की उम्मीद

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संवाद न्यूज एजेंसी
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बस्ती। आम के पेड़ों पर आई बौर देखकर बागवानों की खुशी का ठिकाना नहीं है। उन्हें उम्मीद है कि पिछले साल खराब हुई फसल के नुकसान की इस बार भरपाई हो जाएगी। बंजरिया स्थित फल उत्कृष्टता केंद्र के इंडो इजराइल प्रोजेक्ट की नर्सरी में तैयार गौरजीत, पूसा पूर्वा, पूसा पीतांबरा, टॉमी एटकिंस के अलावा दशहरी, चौसा, लंगड़ा, बैगनफली प्रजातियों में भी अच्छे बौर आए हैं। बागवानी विशेषज्ञ धर्मेंद्र कुमार चौधरी ने बताया कि इन बौरों को कीटों से बचाने के उपाय करने होंगे।
आम के किस्मों और उत्पादन के लिहाज से बस्ती जनपद का नाम सबसे अग्रणी है। यहां की 156 प्रजातियों का प्रदेश ही नहीं विदेशों में भी बोलबाला है। इनमें आम्रपाली, गौरजीत आदि प्रजातियों ने कई आम महोत्सव में नंबर एक का खिताब भी हासिल कर चुकी हैं। जिले में 3713 हेक्टेयर में आम के बाग लगाए गए हैं। इनसे 68.134 मीट्रिक टन आम के उत्पादन का अनुमान है। इससे बागवानों को अच्छा मुनाफा होने की उम्मीद है। पांच हेक्टेयर में आम की बाग के मालिक अखिलेश बताते हैं कि इस बार बौर काफी अच्छा आ रहा है। बस मौसम दगा न दे,यही डर सता रहा है। वहीं आम उत्पादक रामानुज चौधरी, शत्रुध्न सिंह आदि ने भी बौर देखकर अच्छे उत्पादन की उम्मीद लगाई है।
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रोग और कीटों से ऐसे करें बचाव
उद्यान विभाग के बागवानी मिशन के प्रभारी व समन्वयक धर्मेंद्र कुमार चौधरी के मुताबिक इस समय बौर पर रोग व कीट तेजी से हमला करते हैं। अच्छे उत्पादन के लिए पेड़ों पर उर्वरक का प्रयोग करना जरूरी है। किसान दो किलो यूरिया, एक किलो डीएपी, डेढ़ किलो पोटाश, 250 ग्राम कॉपर सल्फेट, 250 बोरेक्श का मिश्रण बनाकर पेड़ों की जड़ों में डालकर सिंचाई करें। किसान विभागीय अधिकारियों से भी बागों में लगने वाले कीट व रोग से बचाव की जानकारी हासिल कर सकते हैं।
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इन रोगों का है खतरा
- आम की बागवानी में भुनगा कीट का प्रयोग, नई कोपलों में आने वाले बौर और इससे बनने वाले छोटे-छोटे फलों में होता है। प्रभावित भाग सूखकर गिर जाता है। ये कीट प्रकोप वाले हिस्से पर शहद जैसा चिपचिपा पदार्थ छोड़ते हैं। इसके चलते पत्तियों पर काले रंग की फफूंद जमा हो जाती है। मादा कीट बौर के मंजरियों, टिकोरों और नए कोपलों पर अंडे देती हैं। ये अंडे सूड़ी में बनकर फलों और कोपलों को अंदर-अंदर खाकर क्षति पहुंचाते हैं। इससे प्रभावित हिस्सा काला पड़कर सूख जाता है। बौर लगने के साथ ही खैरा रोग के प्रकोप का आसार दिखाई देने लगता है। इससे फल और डंठल पर सफेद चूर्ण जैसी फफूंद दिखाई देती है। इससे मंजरियां सूखने लगती हैं। इससे बचाव के लिए प्रभावी कदम उठाना चाहिए।
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कीट-रोग नियंत्रण की मुख्य बातें
-खर्रा व दहिया रोग के रोकथाम के लिए कैलेक्सीन तीन मिली एक लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
-दूसरा छिड़काव कार्बोरिल 0.2 या क्वीनालफास 1.3 मिली और इंडोफिल एम-45 दो ग्राम प्रति लीटर पानी के साथ करने से रोग नहीं लगेंगे।
-फूल खिलने या फल लगने के दौरान मार्शल 1.5 मिली या कंटाफ प्लस 1.5 मिली दवा का छिड़काव करने से बेहतर लाभ मिलेगा।
- आम में जब पूरी तरह से बौर लदे हों तो तब रासायनिक दवा का छिड़काव न करें। इससे परागण प्रक्रिया प्रभावित होने की संभावना बढ़ जाती है।
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