फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Basti News: तफ्तीश में जोड़-घटाने के खेल पर एडीजी की नकेल, बोले- एनसीआर नहीं, दर्ज हो एफआईआर

Mon, 03 Oct 2022 09:09 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती।

सार

अधिकारियों की समीक्षा में पाया गया है कि ज्यादातर थानों पर कई घटनाओं में एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) की जगह एनसीआर (गैर आपराधिक रिपोर्ट) दर्ज की जाती है। एडीजी अखिल कुमार ने एफआईआर को एनसीआर में दर्ज करने की प्रवृत्ति पर भी लगाम लगा दी है।
विज्ञापन
एडीजी जोन अखिल कुमार - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

 तफ्तीश के दौरान आरोपियों की संख्या और मुकदमे की धारा में जोड़-घटाने के खेल पर नकेल कस दी गई है। अब विवेचकों को मुकदमे के पर्यवेक्षण अधिकारी को औचित्य, साक्ष्य और आधार बताना होगा कि किस वजह से मामले में नाम अथवा धारा जोड़ी या घटाई गई।

विज्ञापन


एडीजी गोरखपुर अखिल कुमार ने इस बारे में बस्ती सहित जोन के सभी एसपी को निर्देश दिए हैं। कहा गया है कि विवेचक को आरोपियों की संख्या अथवा धाराओं को घटने या बढ़ाने की दशा में पर्यवेक्षण अधिकारी, सर्किल ऑफिसर, अपर पुलिस अधीक्षक की अनुमति अनिवार्य होगी। पर्यवेक्षकों (सीओ/एएसपी) की भी जवाबदेही तय की गई है। कहा गया है कि वे मुकदमे की प्रगति पर नजर रखें और विवेचकों को मनमानी न करने दें।

अक्सर देखा जाता है कि कई विवेचक पीड़ित अथवा आरोपी से साठगांठ करके आरोपी घटाने-बढ़ाने का खेल करते हैं। दबाव अथवा प्रभाव में आकर धाराओं के साथ भी खिलवाड़ करना आम बात है। इसे लेकर कई बार विवेचकों की शिकायतें उच्चाधिकारियों तक पहुंचती रहती हैं, जिनमें जांच कराने पर विवेचक को जवाब नहीं सूझता है। ऐसी विसंगतियों को रोकने के लिए एडीजी अखिल कुमार ने यह दिशा-निर्देश जारी किया है। एसपी आशीष श्रीवास्तव का कहना है कि सभी विवेचकों व पर्यवेक्षण अधिकारियों को इस निर्देश से अवगत कराया जा चुका है। उन्हें इसका अनुपालन करने के लिए कहा गया है।
विज्ञापन


 

विज्ञापन

यह है मामला

भारतीय दंड संहिता में आईओ यानी विवेचक को मुकदमों के संबंध में व्यापक अधिकार दिए गए हैं। पीड़ित की तरफ से दी गई तहरीर में जो आरोप लगाए गए हैं, उनकी पुष्टि करने के साथ ही यदि कोई नया तथ्य विवेचना के दौरान सामने आता है तो उसे भी संज्ञान लेते हुए मुकदमे में उसी अनुसार धाराएं बढ़ाने का अधिकार है। इसी प्रकार अगर तहरीर में कोई मित्थ्या आरोप लगाए गए हैं और विवेचना यानी तफ्तीश में उसकी पुष्टि नहीं हो रही हो तो उससे संबंधित धारा को मुकदमे से हटाने का अधिकार भी विवेचक को प्राप्त है। यूं कहा जा सकता है कि मुकदमे की दशा और दिशा तफ्तीश करने वाले विवेचक पर निर्भर है। उसी के तैयार किए गए आरोपपत्र के आधार पर ही न्यायालय मुकदमे की सुनवाई करता है।

एनसीआर नहीं, दर्ज हो एफआईआर
अधिकारियों की समीक्षा में पाया गया है कि ज्यादातर थानों पर कई घटनाओं में एफआईआर (प्रथम सूचना रिपोर्ट) की जगह एनसीआर (गैर आपराधिक रिपोर्ट) दर्ज की जाती है। एडीजी अखिल कुमार ने एफआईआर को एनसीआर में दर्ज करने की प्रवृत्ति पर भी लगाम लगा दी है। उनका स्पष्ट कहना है कि तहरीर के अनुसार शत-प्रतिशत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की जाए। साथ ही पुरानी घटना में देर से एफआईआर दर्ज हो रही हो तो संबंधित के विरुद्घ कठोर कार्रवाई की जाए।

इस कड़ाई में विसंगतियां
वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश प्रताप सिंह का कहना है कि कई बार पीड़ित चीजों को काफी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं। अपनी खुन्नस निकालने के लिए अपने ऐसे विपक्षी को भी नामजद करा देते हैं, जो निर्दोष होते हैं। इसी तरह फर्जी आरोप लगाकर ऐसी धाराओं में मुकदमा दर्ज कराने में कामयाब हो जाते हैं, जो मनगढ़ंत होते हैं। विवेचक तफ्तीश में इस तरह की विसंगतियों को पकड़कर गुण-दोष के आधार पर चार्जशीट तैयार करता है। इस कड़ाई से फर्जी नामजदगी और मनगढ़ंत आरोप से छुटकारा पाना मुश्किल हो जाएगा।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें