मुआवजे की बाधा खत्म, पूरी होगी परियोजना
लुम्बिनी-दुद्धी टू-लेन परियोजना पर लगा था ग्रहण
570 करोड़ रुपये की है ककरहवा-रुधौली-कलवारी-बनारस टू-लेन परियोजना
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। भगवान बुद्ध की तपोस्थली लुंबिनी को शिव की नगरी काशी (वाराणसी) से जोड़ने वाली 570 करोड़ की बहु-महत्वाकांक्षी परियोजना पर लगा ग्रहण छंट चुका है। फुटहिया-महरीपुर के किसानों के बीच फंसी रार समाप्त हो गई। नए सर्किल रेट के आधार पर तय दर से 113 किसानों/कास्तकारों को मुआवजा देने की प्रक्रिया शुरू होते ही 20 जनवरी 2016 को केंद्रीय भूतल परिवहन, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी का वादे पूरे होने के आसार बढ़ गए। गांव के करीब 60 फीसदी किसानों को औसतन नौ हजार रुपये प्रति एअर के हिसाब से मुआवजा दिया जा चुका है। जिला मुख्यालय से सटा होने के बावजूद अति दुर्गम स्थल की पहचान बनती जा रही थी। माकूल मुआवजा न मिलने से अरबों रुपये की टू-लेन परियोजना पर ग्रहण लगा था। फोरलेन पर फुटहिया चौराहे से कलवारी मार्ग पर मुड़ने से महरीपुर गांव के डेढ़ किलोमीटर तक की स्टेट हाईवे की जमीन को लेकर किसानों और एनएच अथॉरिटी में 2013 से पेंच फंसा था। मगर अब मुआवजे की बाधा दूर हो चुकी है। वहां के 113 किसानों/काश्तकारों को नए सर्किल रेट से मुआवजा दिया जा रहा है। 20 जनवरी 2016 को केंद्रीय भूतल परिवहन, राजमार्ग और जहाजरानी मंत्री नितिन गडकरी ने पूर्वांचल को 50 हजार करोड़ रुपये की जिन परियोजनाओं की सौगात देने की बात कही थी, उनमें नेपाल सीमा से (लुंबिनी-दुद्घी एनएच-230) ककरहवा-रुधौली-कलवारी-बनारस टू-लेन परियोजना की भी आधारशिला रखी गई थी। बता दें कि महरीपुर के किसानों का राजमार्ग प्राधिकरण से जमीन की दावेदारी को लेकर विवाद था। किसानों का कहना था कि अथॉरिटी बिना किसानों की सहमति के हाईवे के लिए अधिग्रहीत कर लिया। जबकि खतौनी-खसरा जैसे राजस्व अभिलेखों में किसानों का नाम दर्ज है। जबकि पहले लोक निर्माण विभाग और अब स्टेट हाईवे अथॉरिटी के अभिलेखों में वह सड़क के रूप में दर्ज है। इसीलिए किसान और हाईवे अपनी-अपनी दावेदारी करते रहे। अब दोनों पक्षों ने बीच का रास्ता निकालते हुए सहमति व्यक्त की।
जनहित में सहमत हुए
महरीपुर के किसान भीम सिंह का कहना है कि इतनी बड़ी परियोजना में किसानों का मामूली रकबा बिना उचित मुआवजा दिए अधिग्रहीत करना अनुचित है। क्योंकि जमीन हाथ से निकलने के बाद उनके पास जीविका का साधन नहीं बचेगा।
जबरदस्ती दबाव बनाया
गांव के समरेंद्र विक्रम सिंह का कहना है कि 2013 से लेकर लगातार वे लोग संघर्ष कर रहे हैं। कई बार सरकारी मशीनरी ने जबरदस्ती करने का दबाव बनाया लेकिन वजूद का सवाल होने की वजह से गांव वाले डटे रहे।