धान, गेहूं व गन्ना का निश्चित रकबा है। हर साल फसल कभी थोड़ी कम तो कभी ज्यादा की पैदावार होती है। सरकार इसका मूल्य निर्धारित करती है और खरीद भी हो जाए तो अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे में सरकार औद्यानिक खेती के अलावा फलों की खेती को बढ़ावा देने की योजना पर काम कर रही है।
जिले में खेती योग्य कुल 1.80 लाख हेक्टेयर भूमि है। इसमें से 1.07 लाख हेक्टेयर में धान तो 1.20 लाख हेक्टेयर में गेहूं की खेती होती है। गन्ना की खेती महज 18 हजार हेक्टेयर में यहां के किसान करते हैं। साग भाजी की खेती 29909 हेक्टेयर में होती है। किसानों की मानें तो इन फसलों की खेती से उत्पादन लागत से लाभ का अनुपात बेहद कम है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. कृष्ण मोहन चौधरी की मानें तो औद्यानिक अथवा फलों की खेती अपने जिले में बेहद कम क्षेत्रफल यानी मात्र 7230 हेक्टेयर में की जाती है। कई क्षेत्रों में बाग हैं जरूर मगर वे पुराने हो चुके हैं, जिससे उनकी फलत प्रभावित हो गई है। ऐसे में जरूरी है कि किसान बागों का जीर्णोद्धार कराएं और फलों की खेती की ओर मुड़ें तभी अपेक्षित लाभ मिल सकेगा। औद्यागिक प्रयोग एवं प्रशिक्षण केंद्र के संयुक्त निदेशक डॉ. आरके तोमर कहते हैं कि फलों व औद्यानिक फसलों की खेती से किसान अधिक लाभ कमा सकेें। इसका प्रयोग अब शुरू हो गया है। सरकार इसे लेकर गंभीर है। जिले में सेंटर फार एक्सीलेंस लागू करने के पीछे सरकार की मंशा है कि किसानों का आर्थिक उन्नयन करने के लिए उन्हें फलों व औद्यानिक फसलों की खेती का प्रशिक्षण दिया जाए, जिससे वे लाभकारी खेती को अपना सकें।