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फोटो...शरीयत मुताबिक तीन तलाक अध्यादेश कबूल

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शरीयत मुताबिक तीन तलाक अध्यादेश कबूल
केंद्र के अध्यादेश पर फिर छिड़ी गरमागरम बहस
अमर उजाला टीम से खुलकर आई मिली-जुली प्रतिक्रिया
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। तीन तलाक के बहुचर्चित मुद्दे पर बुधवार को अध्यादेश पारित होते ही कानूनविदों, समाजशास्त्रियों और धर्मगुरुओं में फिर गर्मागर्म बहस छिड़ गई। सोशल मीडिया से लेकर लंच ब्रेक के दौरान कैंटीन और सियासी सभाओं में इसके नफा-नुकसान के चर्चे सुर्खियों में रहे। कुछ लोग इसे एससी/एसटी मुद्दे से ध्यान हटाने का पैंतरा करार देते रहे तो तमाम लोग इसे वोट की फसल बताते नहीं थक रहे हैं। बुधवार के सबसे ज्वलंत मुद्दे पर अमर उजाला टीम अलग-अलग वर्ग की प्रतिक्रिया जानने निकली तो इसे लेकर मिली-जुली बात सामने आई।
कई देशों में पहले से पाबंदी
कानूनविद् प्रदीप चंद्र पांडेय का मानना है कि विश्व के ज्यादातर विकसित देशों में तीन तलाक को लेकर काफी पहले से पाबंदी है। केंद्र सरकार के इस कदम की प्रशंसा करते हुए कहा कि इससे मुस्लिम महिलाओं की जिंदगी बेहतर होगी और परिवार में उनका सम्मान भी बढ़ जाएगा।
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रातनीति को धर्म से जोड़ना अनुचित
वरिष्ठ अधिवक्ता मोहम्मद शफीक ने कहा कि धर्म को राजनीति से जोड़कर वोट की रोटी सेंकना अनुचित है। धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं को राजनीति की परिधि में लाना गैर जिम्मेदाराना रवैया है। शरीयत को चुनौती देकर समाज को गलत दिशा देने की कोशिश नहीं होनी चाहिए।
रूढ़िवादी रिवाज घातक
गांधीनगर रामजानकी मंदिर के पुजारी पं. गोपेश्वर त्रिपाठी कहते हैं कि समाज में जितना हक पुरुष का है, उतना ही महिलाओं का भी। रूढ़िवादी परंपरा थोपना सभ्य समाज की निशानी नहीं है। मुस्लिम महिलाओं की आवाज को अध्यादेश के रूप में केंद्रीय कैबिनेट ने पास किया है।
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अध्यादेश उचित, उल्लंघन अनुचित
नगर बाजार स्थित दारूल उलूम के प्रधानाचार्य मौलाना मुनव्वर कहते हैं कि अध्यादेश का स्वागत है लेकिन शरीयत की खिलाफत न हो। यदि पत्नी का आचरण कबूल करने योग्य न हो तो पहला और दूसरा तलाक देकर मौका देना चाहिए। न सुधरे तभी तीन तलाक की इजाजत शरीयत देती है।
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