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समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल हुए राजकिशोर

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कभी मायावती और मुलायम के करीबी थे राजकिशोर
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समर्थकों के साथ कांग्रेस में शामिल हुए पूर्व राज्यमंत्री
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती/हर्रैया। सपा-बसपा गठबंधन में मंडल की तीनों सीटें बसपा के कोटे में जाने से नाराज चल रहे सपा सरकार में मंत्री रहे राजकिशोर सिंह ने भले ही कांग्रेस का दामन थाम लिया हो, लेकिन एक समय था जब दोनों पार्टियों में उनकी तूती बोलती थी। दोनों के शासनकाल में वह मंत्री भी रहे।
छात्रसंघ चुनाव से अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत करने वाले राजकिशोर सिंह पहली बार 2002 में बसपा के टिकट पर हर्रैया विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। तब मायावती सरकार में 32 वर्ष की उम्र में कैबिनेट मंत्री बनने के बाद उन्हें बसपा सुप्रीमो का करीबी माना जाने लगा। वर्ष 2003 में मायावती की तरफ से विधानसभा भंग करने की सिफारिश किए जाने के बाद बसपा में हुए बगावत के बीच सपा की मुलायम सरकार बनाने में अपनी भूमिका के चलते वहां भी राजकिशोर मंत्री बने। वर्ष 2007 के चुनाव में बसपा की लहर के बाद भी जिले में सपा का परचम लहराने में सफल रहे राजकिशोर को मुलायम सिंह और शिवपाल यादव का करीबी माना जाता था। वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में सपा प्रत्याशी बनकर दूसरे स्थान पर रहने वाले राजकिशोर वर्ष 2012 लगातार तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीतकर अखिलेश यादव सरकार में तीसरी बार कैबिनेट मंत्री बने। कैबिनेट विस्तार में पंचायती राज जैसे महत्वपूर्ण विभाग का जिम्मा देकर अखिलेश यादव ने उनका कद बढ़ाया।
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बेटे देवेंद्र प्रताप सिंह शानू को निर्विरोध जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाकर भी अपना लोहा मनवाया। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी लहर के बावजूद सपा के टिकट पर उनके भाई वृज किशोर सिंह डिंपल ने कड़ी चुनौती पेश की। उन्हें मामूली अंतर से हार मिली। इसी के बाद से सपा में उनका ग्राफ कमजोर होता गया। पहले एमएलसी चुनाव में भाई डिंपल का टिकट काटा गया और बाद में उन्हें मंत्री पद से हटा दिया गया। इसके बाद भी राजकिशोर व उनका कुनबा सपा में बना रहा। विधानसभा चुनाव में हुई हार के बाद वह लोकसभा चुनाव की तैयारी में लगे थे। गठबंधन होने के बाद सीट बसपा खाते में जाने से लगे झटके के बाद वह खामोश रहकर आगे की रणनीति पर विचार करने में जुटे थे। अंतत: उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ले ली।
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