बात-बात पर मुकदमा, मनमानी तफ्तीश
बस्ती।
हर शिकायत पर एफआईआर दर्ज करने का फार्मूला न तो पुलिस को रास आ रहा है, न ही अवाम को। उलटे पेशबंदी करने वालों के मंसूबे कामयाब हो रहे हैं। अव्यावहारिक पहल का फायदा उठाकर निजी खुन्नस निकालने के मामले तेजी से बढ़ी हैं। गंवई राजनीति के मद्देनजर झूठी तहरीर पर भी रेप, मर्डर, दहेज हत्या जैसी गंभीर धाराओं में एफआईआर दर्ज करने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। पुलिस के इस रवैए से लोग भयग्रस्त हैं। कब किस थाने में किसके खिलाफ एफआईआर दर्ज हो जाएगी, यह कहना मुश्किल है।
जिले के कोतवाली सहित 16 थानों (महिला थाना के अतिरिक्त) में जनवरी 2017 से लेकर बीते पहली जुलाई तक के सात महीने में 13 हजार 242 एफआईआर दर्ज हुईं। जो पिछले वर्ष की तुलना में डेढ़ गुनी है। सिर्फ 210 दिन में औसतन प्रतिदिन 63 मुकदमे दर्ज होने के सापेक्ष तफ्तीश की रफ्तार शून्य है। यद्यपि पहाड़ जितने ऊंचे मुकदमों की फेहरिश्त में मोटर वाहन और सीआरपीसी और आईपीसी में निरुद्ध करने की कार्रवाई भी शामिल है लेकिन ऐसे संगीन धाराओं में भी मुकदमे दर्ज कर दिए गए, जिसकी असलियत पुलिस पहले से जानती थी। इस आपाधापी के पीछे काम का बोझ और ऊपर का दबाव भी कारण है लेकिन इतने ज्यादा मुकदमों को निस्तारित करने केे लिए उनके पास ज्यादा विकल्प भी नहीं हैं। हालांकि, नेतृत्व की अदूरदर्शिता भी इसके पीछे बड़ा कारण है। क्योंकि दर्जन भर से ज्यादा अनुभवी इंस्पेक्टर/सब-इंस्पेक्टर बेकार पड़े हैं। उनसे इस तरह के काम अच्छे ढंग से लिए जा सकते थे।
गर्त में गई विवेचना की गुणवत्ता
क्रिमिनल मुकदमों के जानकार अधिवक्ताओं का कहना है कि मौजूदा समय में पुलिस के विवेचना का स्तर सबसे निम्न हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता शंकर दयाल त्रिपाठी के अनुसार विवेचक गुण-दोष के आधार पर आरोप पत्र तैयार करने की जगह अपनी सुविधा अनुसार पर्चे काट रहा है। प्रलोभन में पड़कर सामने के सबूतों को नजरअंदाज करते हुए अटपटे तथ्यों पर तफ्तीश पूरी कर रहे हैं।
दबाव व लालच में डोल रहा ईमान
आईपीसी में असीमित अधिकार प्राप्त करने के बावजूद विवेचक का ईमान अक्सर दबाव और लालच में डोलते देखा जा रहा है। ऐसे अनगिनत मामले सामने आए, जिनमें झूठा फंसाने की बात जानने के बावजूद विवेेचक ने न्यायालय में उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। मगर आरोपी ने ऐन-केन-प्रकारेण विवेेेचना बदलवाकर नए विवेचक को प्रसन्न कर लिया तो वह बेदाग बच निकल रहा है।
पुलिस रिकॉर्ड में हुए दागी
प्रत्येक शिकायत एफआईआर मानने के लिए पुलिस को सिस्टम में बदलाव करना पड़ेगा। अब तक होता रहा कि जिसके नाम से थाने में एफआईआर दर्ज हो गई, वह दागी हो जाता था। उसके बाद में नौकरी, विदेश यात्रा, शस्त्र लाइसेंस अथवा प्रत्येक पुलिस वेरिफिकेशन में उसे मुश्किल आती है। भले ही न्यायालय से उसे मोहलत मिल जाए लेकिन तात्कालिक मुसीबत से वह नहीं बच पाता है।