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फ्लैश बैक- जनपद का प्लास्टिक कांप्लेक्स नहीं बन सका मुद्दा

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फ्लैश बैक फोटो
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प्लास्टिक कांप्लेक्स के लिए नहीं उठी आवाज
सीएम हेमवतीनंदन बहुगुणा ने किया था कांप्लेक्स का शिलान्यास
186 एकड़ भूमि पर 150 उद्योग लगाए गए थे पर अब सब बंद
राज प्रकाश
बस्ती। बात वर्ष 1962 की है। बस्ती लोकसभा क्षेत्र अनारक्षित हो चुकी थी। कांग्रेस प्रत्याशी केशवदेव मालवीय यहां से सांसद चुने गए। दूरगामी सोच के धनी मालवीय ने जनपद के युवाओं के लिए प्लास्टिक कांप्लेक्स की सौगात दी। उनकी सोच थी कि युवा रोजगार की तलाश में पलायन न करें, मगर योजना को अमली जामा पहनाने के बाद भी यह उपेक्षा की शिकार हो गई। न तो किसी जनप्रतिनिधि ने कांप्लेक्स के लिए पहल की और न ही सरकारी स्तर पर कोई प्रयास हुआ।
केशवदेव मालवीय ने कांटे मार्ग पर औद्योगिक केंद्र के तौर पर प्लास्टिक कांप्लेक्स की स्थापना कराई। इस स्थान पर छोटे-बड़े कई व्यापारियों ने निवेश भी किया। काफी संख्या में युवाओं को रोजगार भी मिला, लेकिन वक्त ने करवट बदला और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के चलते यहां उद्योगों की भट्ठियां ठंडी पड़ गईं। कर्ज में डूबे उद्योगपति नौकरी की तलाश में पलायन कर गए और जहां उद्योग स्थापित थे, वहां सन्नाटा छा गया। फैक्ट्रियों पर ताले लग गए। अब कांप्लेक्स में एक भी उद्योग नहीं है। वर्ष 1974 में प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हेमवतीनंदन बहुगुणा ने प्लास्टिक कांपलेक्स का शिलान्यास किया था। केशवदेव मालवीय ने जो औद्योगिक नगरी का सपना देखा था उसे धरातल पर लाने की योजना को अमली जामा वर्ष 1982 में मिला।
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यहां की 186 एकड़ भूमि पर करीब 150 उद्योग लगे। नाम रखा गया प्लास्टिक कांप्लेक्स। कारण यहां अधिकतर प्लास्टिक सामान के उद्यम स्थापित हुए थे। उद्यमियों ने पूरे मनोयोग से काम शुरू किया और पूंजी के लिए वित्तीय संस्थाओं की ओर हाथ बढ़ाया मगर उनकी जरूरत आधी भी पूरी नहीं हो सकी। उद्यम बचाने के लिए यहां के दर्जनों उद्यमियों ने अपनी पूंजी झोंक दी, मगर पूंजी की कमी और इन्फ्रास्ट्रक्चर का अभाव बाधा बन गया। 150 इकाइयों की गति दो वर्ष में ही मंद पड़ने लगी। अफसोस तो यह है कि न तो किसी जनप्रतिनिधि ने और न ही जिम्मेदारों ने इसे बचाने की कोई पहल की। नतीजतन पांच वर्ष गुजरते- गुजरते यहां उद्यम का पहिया थमने लगा। कई उद्यमी तो पांच वर्ष में ही यहां से हट गए, जो बचे थे वे अपनी पूंजी निकालने के लिए जद्दोजहद करने लगे। वर्ष 1987 तक 80 प्रतिशत उद्योगों पर ताला लटक गया।
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चैंबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष अशोक सिंह बताते हैं कि उन्होंने यहां नल की फैक्ट्री डाली थी। घर की पूंजी भी डूब गई और हजारों का कर्ज लाखों में बदल गया। इकाई बीमार हो गई, मगर जिम्मेदारों ने उसके लिए एक कदम भी नहीं बढ़ाया। इसके लिए जन प्रतिनिधियों को जिम्मेदार बताते हुए उन्होंने कहा कि प्लास्टिक कांप्लेक्स की बदहाली के पीछे सिर्फ और सिर्फ जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा है।
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