फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

बाढ़ थमी, कटान से दहशत

विज्ञापन
विज्ञापन
बाढ़ थमी, कटान से दहशत
विज्ञापन

विक्रमजोत।
घाघरा का जलस्तर दो दिन घटने के बाद सोमवार को स्थिर हो गया। केंद्रीय जल आयोग अयोध्या कार्यालय के मुताबिक नदी 93.25 सेमी. पर टिकी है। जो कि खतरे के निशान 92.73 से 52 सेमी. अधिक है। लोलपुर-विक्रमजोत बांध के भदोई ठोकर नंबर दो क्षतिग्रस्त है। घटने के क्रम में नदी का तेज प्रवाह सीधे यहां के दो ठोकरों से ही टकरा रहा है। रविवार को ठोकर का अगला हिस्सा धंस गया, जिसकी मरम्मत कार्य बाढ़ प्रखंड के अधिकारियों की निगरानी में चल रहा है।
यहां कल्याणपुर, सहजौरापाठक और भरथापुर के घरों से पानी हट चुका है। कचरे और फसलों की सड़ांध से लोग परेशान हैं। घर से बाहर शरण लिए लोग अभी भी सरकारी भोजन के भरोसे हैं। पैकेट में पर्याप्त भोजन और सभी को नहीं मिल पाने के कारण नाराजगी भी है। इसकी शिकायत कुछ लोगों ने जिम्मेदारों से की जिसके बाद भोजन मिल सका। तीनों गांवों में पशुओं में गलाघोंटू और मुंहपका का संक्रमण फैल रहा है। पूर्व प्रधान ह्दयराम यादव की भैंस मर चुकी है जब कि कई पशुओं के पेट फूलने और चारा न खाने की समस्या मुसीबत में बदल गई है। जिले के डॉक्टरों की एक टीम पहुंची है मगर सहजौरा गांव के जगन्नाथ यादव, रुकमिना, रामचन्दर ने बताया कि सभी पशुओं का टीकाकरण नहीं हो पाया। डॉक्टर दोपहर 12 बजे के बाद आते हैं और भूसे के अभाव में सभी पशुओं को चारागाह की ओर तब तक ले जा चुके होते हैं। सरकारी महकमा टीकाकरण के नाम पर सिर्फ खानापूरी कर रहा है।
विज्ञापन

तीन मीटर कटा चांदपुर बांध का स्लोप
दुबौलिया। कटरिया-चॉदपुर बांध पर दोपहर में चॉदपुर गांव के पास स्लोप का दो से तीन मीटर हिस्सा नदी में कट गया। गांव वालों ने इसकी सूचना स्पर पर काम करा रहे मजदूरों और बाढ़ खंड के अधिकारियों को दी। गांव वालों ने नाराजगी जताई कहा कि पिछले दो सप्ताह से बांध के पास कटान की सूचना देते रहे लेकिन किसी ने कोई ध्यान नहीं दिया। बाध का स्लोप कटने से अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गये। मौके पर अधिशासी अभियंता डीके त्रिपाठी, एसडीएम हर्रैया दिनेश कुमार, विधायक चन्द्र प्रकाश शुक्ला, सीओ कलवारी अरविंद कुमार वर्मा, प्रभारी निरीक्षक पंकज गुप्ता ने लोगों को समझा बुझा कर शांत कराया। अब बोरियों र्में इंट भर कर कैरेट बनाकर और बोल्डर डाला जा रहा है।
सुबिखा बाबू में राहत सामग्री बांटी
दुबौलिया। बाढ़ के पानी से पूरी तरह घिरे दुबौलिया ब्लॉक के सुविखा बाबू में सोमवार को राहत सामग्री बांटी गई। सामग्री बांटने के लिए नाव से क्षेत्रीय विधायक चन्द्र प्रकाश शुक्ला, एसडीएम दिनेश कुमार, सीओ अरविंद वर्मा पहुंचे। यहां 55 परिवारों को लाई, चना, मोमबत्ती, माचिस का वितरण किया गया। इस मौके पर ग्राम प्रधान अनिल सिंह, भाजपा नेता चतुर्गुन राजभर, भगवान बक्स सिंह, जगजीवन सिंह, दुर्गेश आदि लोग मौजूद रहे ।

गोरखपुर की बाढ़ का विद्युत आपूर्ति को झटका
बस्ती। विद्युत आपूर्ति को लेकर शहर और ग्रामीण इलाकों की अलग-अलग व्यवस्था को गोरखपुर की बाढ़ ने झटका दे दिया है। 220 केवी की लाइन मगहर में डैमेज हो गई है। इसे ठीक करने में अब भी 24 घंटे लगेंगे। इससे ग्रामीण इलाकों में आपूर्ति बाधित की गई है। हर तीन घंटे पर रोस्टरिंग विभाग ने जारी कर दिया है।
शासन का फरमान शहर को 24 तो गांवों में 22 घंटे विद्युत आपूर्ति का है। इसके तहत विभाग कमर कसने में जुटा है कि शनिवार को अचानक गोरखपुर में आई बाढ़ ने विद्युत आपूर्ति को झटका दे दिया। गोरखपुर ट्रांसमिशन से आने वाली 220 केवी की लाइन में मगहर के पास अचानक बड़ा फाल्ट आ गया। इसका परिणाम जिले को मिलने वाली विद्युत की आपूर्ति ट्रांसमिशन से कम कर दी गई। शनिवार की शाम आए इस फाल्ट को ठीक करने के लिए विभागीय कर्मी जुटे जरूर हैं, मगर अब तक कोई विशेष प्रगति नहीं हो सकी है। अधिकारियों का मानना है कि इसके चलते आपूर्ति बाधित हो गई है और इसे दुरुस्त करने में अभी भी 24 घंटे लगेंगे। फाल्ट के चलते जहां ग्रामीण इलाकों में रोस्टरिंग शुरू कर दी गई है। वहीं, शहरी क्षेत्र में भी इसका असर नजर रहा है। शहर में आपूर्ति तो नहीं रोकी गई है, मगर इसके चलते लो वोल्टेज की समस्या शहरी झेल रहे हैं।
विद्युत वितरण खंड प्रथम के अधिशासी अभियंता एके सिंह ने बताया कि ट्रांसमिशन से आने वाली लाइन में कुछ फाल्ट आ गया है। इसके चलते ग्रामीण इलाकों में आपूर्ति में दिक्कत आ गई है। 220 केवी के लाइन को ठीक करने में अभी 24 घंटे लगेंगे। इस बीच ग्रामीण इलाकों में हर तीन घंटे पर रोस्टरिंग की जा रही है।


माटी के मोह में झेल रहे बाढ़

विक्रमजोत।
हर साल उजड़ना और बसना तीन गांव के लोगों की नियति बन चुकी है। कटान करती घाघरा की गोदी में आ चुके सहजौरा पाठक, कल्याणपुर, भरथापुर गांव के कई परिवार पलायन कर चुके लेकिन कुछ ऐसे हैं जो माटी के मोह के चलते बाढ़ झेलने को मजबूर हैं।
इन गांवों के लोग दो तरह के आशियाने बनाते हैं। पहला वह मूल गांव जो नदी की दो धाराओं से घिरा रहता है। दूसरा विक्रमजोत-धुसवा बांध पर। बाढ़ के दो महीने यहां एक झोपड़ी में गुजर बसर करते हैं। राशन प्रधान और कोटेदार की कृपा पर निर्भर है। राशनकार्ड होते हुए भी बमुश्किल से 10 किलो चावल और 15 किलो गेहूं मिलता है।
कल्याणपुर के 71 वर्षीय सतीश चंद्र पांडेय बताते हैं कि सन 1960 से 70 के दशक में तीनों गांव की आबादी पांच हजार से अधिक हुआ करती थी। कुछ का आशियाना और खेत बाढ़ की भेंट चढ़ा तो तमाम लोग परदेश कमाने गए और वहीं के होकर रह गए। जो बचे हैं वे हर साल यह सोचते हैं कि इस बार कहीं नया ठिकाना बना लेंगे लेकिन माटी के मोह मे फंसकर पड़े रहते हैं। 81 वर्षीय प्रेमचन्द्र नाई अपने बचपन को याद करते हैं। बताते हैं कि आज जहां हरहराती नदी है वह चार दशक पूर्व छह किमी दूर अयोध्या से सटकर बहती थी। बीच में 8-10 गांव बसे थे। 1968 की बाढ़ ने पुराने चकिया, आइलिया, रामपुर, मिर्जापुर, शिवपुल पिकौरा, प्रीतपुर, हनुमानपुर, रामपुर आदि कटान की भेंट चढ़ गए। अंग्रेजी हुकूमत में बना आज हाईवे भी कट गया था। तब प्रदेश सरकार ने विक्रमजोत से बाईपास सड़क कटरा होकर अयोध्या जोड़ने वाली बनाई थी। इस बार फिर घाघरा का रुख हाईवे की ओर है। बाढ़ प्रबंधन ने फोरलेन की सुरक्षा के लिए लोलपुर-विक्रमजोत बांध बना दिया लेकिन खतरा अभी टला नहीं है।
1960 में सरपंच रहे श्रीकांत पांडेय बताते हैं कि नदी 1904-05 और 1943 में मुख्य सड़क को काट चुकी है।11 गांव गैरचिरागी हो गए। हजारों हेक्टेयर खेती की जमीन बह गई। एक मशहूर वेलवा बाजार हुआ करता था जो सीतारामपुर और रामपुर मौजे तक फैला था। 1968 में एक हजार घर थे लेकिन बाढ़ ने सब तबाह कर दिया। लोग बाघानाला और विक्रमजोत गांव में आ बसे।
अब हम नहीं उजड़ेंगे
कल्याणपुर के ग्रामप्रधान संजय यादव बताते हैं कि मेरी ग्राम पंचायत के 40 फीसदी लोग दूसरे गांवों में जा बसे हैं। जहां के मतदाता भी बन गए। गांव को दो ही महीने में बाढ़ तहस-नहस कर देती है। तीन साल पहले बांध बनना शुरू हुआ तो लगा कि अब हम नहीं उजड़ेंगे मगर नेतागीरी, मुआवजे और ठेकेदारी के चक्कर में वह काम भी रुकवा दिया। इससे तीन सालों से बाढ़ का प्रकोप झेल रहे हैं।
गेहूं की उपज से चलता है घर
गांव वालों को जाते जाते बाढ़ उर्वरा भूमि दे जाती है। बाढ़ में आई काप मिट्टी जमा होने से नयी जमीन तैयार हो जाती है। इसमें बगैर ज्यादा खर्च के ही गेहूं की सर्वाधिक पैदावार होती है। दूसरे कास (छप्पर बनता है) काट कर बेचने से भी खासा मुनाफा होता है। शेष समय मजदूरी करके नकदी कमा लेते हैं। सड़क विहीन होने से माझा में कच्ची शराब की भट्ठियां धधकती रहती हैं। उनपर काम करने से अन्य खर्चे भी चल जाते हैं। यहां के लोगों का पढ़ाई-लिखाई से विशेष वास्ता नहीं रहता। दिनभर जानवरों को चराने और चारे की व्यवस्था में व्यतीत करते हैं।
विज्ञापन

बेटों की शादी की परेशानी
रोजी-रोटी के साथ कहीं दूसरी जगह घर बनाने के लिए कुछ लोग दिल्ली-मुंबई कमाने जरूर जाते हैं। क्योंकि घाघरा के गोद में बसे गांवों में लड़कों की शादी करने बहुत कम लोग पहुंचते हैं। यहां के लोग बेटी की शादी तो रिश्तेदार या कहीं बाहर जाकर कर देते हैं क्योंकि बारात भी कभी-कभी नाव से आती है। लेकिन बेटे का ब्याह हो जाए इसके लिए परेशानी उठाते हैं। सहजौरा के सुखई बताते हैं कि लड़कों की शादी बड़ी मुश्किल से होती है। यहां के हालात देखकर कोई लड़की की शादी यहां करने ही नहीं आता। घर कैसे बसे यह समस्या बनी रहती है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें