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पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाली पर रार, बरकरार

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पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाली पर रार बरकरार
तीन दिन कार्य बहिष्कार के बाद काम पर लौटे सरकारी कर्मी
सरकार पर राज्य कर्मियों ने लगाया दोहरे मापदंड का आरोप
सांसद, विधायक व एमएलसी को भी जिम्मेदार ठहरा रहे कर्मी
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। पुरानी पेंशन व्यवस्था बहाली को लेकर तीन दिन तक चले कार्य बहिष्कार के बाद शनिवार को राज्यकर्मचारी काम पर लौटे। हालांकि, वापसी के बाद भी सरकार की ओर से कोई पहल न होने का मलाल कर्मियों को है। इसे लेकर अब भी सरकार से रार बरकरार है।
राज्य कर्मचारियों का संगठन अब पुरानी पेंशन व्यवस्था के लिए नए आंदोलन की रणनीति और दशा दिशा देने की योजना बना रहे हैं। वे सिर्फ सरकार को ही नहीं बल्कि सांसद, विधायक व एमएलसी को भी इसके लिए जिम्मेदार करार देते हैं। कर्मचारी नेताओं से शनिवार को बातचीत में कहा कि पेंशन ही बुढ़ापे की लाठी के समान है।
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राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के वरिष्ठ उपाध्यक्ष रामअधार पाल ने कहा कि 60 वर्ष की उम्र तक राजकीय सेवा करने के बाद राज्य कर्मियों को पेंशन का अधिकार नहीं है, मगर मात्र शपथ लेने भर से सांसद, विधायक व एमएलसी को स्वयं व उसके परिवार को पेंशन की सुविधा आखिर क्यों सरकार दे रही है। यह दोहरा मापदंड अब नहीं चल सकेगा। सरकार चाहे जिसकी रही हो, कर्मियों के हित की अनदेखी की गई है। लोकतंत्र में जितना अधिकार सत्तासीन नेताओं को है उतना ही अधिकार आम नागरिक को प्राप्त है। सरकार को पुरानी पेंशन बहाल करनी ही होगी, वरना सरकार खामियाजा भुगतने को तैयार रहे। कोषागार कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अखिलेश पाठक ने कहा कि अंग्रेजों के शासनकाल से चली आ रही पेंशन व्यवस्था को भाजपा सरकार ने एक झटके से समाप्त कर दिया। 2005 से नौकरी में आए लोग अवकाश प्राप्त होने पर पुरानी पेंशन नहीं पाएंगे। यह फैसला सरकार का है। सरकार कर्मचारियों के बुढापे का सहारा छीन रही है। इसका दंड सरकार को मिलेगा। पुरानी पेंशन बहाली न हुई तो कर्मचारी ईंट से ईंट बजा देंगे।
विकास भवन कर्मचारी संघ के अध्यक्ष अजीत सिंह ने कहा कि सरकार कर्मचारियों के साथ विश्वासघात कर रही है। उनके बुढ़ापे के जीवन यापन के लिए पेंशन सहारा होता है किन्तु सरकार ने 2005 से पुरानी पेंशन को बंद कर न्यू अंशदायी पेंशन व्यवस्था लागू कर कर्मियों के साथ अन्याय कर रही है।
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कर्मचारी नेता तौलू प्रसाद ने कहा कि देश की आजादी में तमाम ने कुर्बानी दी थी। किसी ने देश उन्हें क्या देगा यह तय नहीं किया था, मगर आज कुर्सी पर बैठे सत्ताधारी ताकतें सेवा के बदले वेतन व पेंशन ले रही हैं। इसे अब वे अपना अधिकार मान रहे हैं, मगर 60 वर्ष तक सेवा देने वाला कर्मचारी इससे महरूम कर दिया गया है। सरकार व उसके नुमाइंदे केवल अपनी जेब भरने में जुटे हैं। कर्मी व उनका परिवार सरकार के लिए दोयम है। जिनके दम पर वे कुर्सी पर पहुंचते हैं उनसे उनका अधिकार छीनने का यह सरकार प्रयास कर रही है।
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