फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

भानपुर खटिकहिया में उल्टी-दस्त का कहर

विज्ञापन
विज्ञापन
तीन दिन में उल्टी दस्त से दो की मौत
विज्ञापन


भानपुर।
भानपुर खटिकहिया पुरवे में उल्टी-दस्त का प्रकोप बढ़ गया है। तीन दिन के भीतर दो बच्चियों की मौत से लोगों में दहशत है। सात लोग अब भी पीड़ित हैं जिसमें से एक की हालत गंभीर होने पर आनन-फानन जिला अस्पताल भेज दिया गया।
घटना की जानकारी होने पर डॉक्टरों की टीम ने गांव में पहुंचकर पीड़ितों में दवाइयां बांटी। साफ-सफाई का सुझाव दिया। अस्पताल प्रबंधन को बीमारी फैलने की जानकारी तब हुई जब सोमवार देर रात भानपुर निवासी तीन वर्षीय अर्चना पुत्री अशोक कुमार की उल्टी-दस्त से हालत बिगड़ने पर सीएचसी लाया गया। यहां इलाज के कुछ देर बाद उसकी मौत हो गई। मंगलवार सुबह सीएचसी पहुंचे लोगों ने अस्पताल में हंगामा किया। गांव में कई लोगों के उल्टी, दस्त से पीड़ित होने की जानकारी अधीक्षक डॉ. रवीन्द्र वर्मा को दी गई। जिसे संज्ञान लेकर अधीक्षक ने पीड़ितों को अस्पताल बुलवाकर भर्ती कराया और गांव में डॉक्टरों की टीम भेज कर दवाओं का वितरण किया गया। अस्पताल में भर्ती मरीज विमलादेवी (45) पत्नी राम सेवक, दुर्गेश (16) पुत्र अरविन्द, रिंका (18) पुत्री अरविन्द, रितुराज (6) पुत्र रमेश, विनीत(10) पुत्र राम सेवक, नीलम (16) पुत्री रामसेवक को प्राथमिक उपचार के बाद घर भेज दिया गया जबकि श्यामकली (46) पत्नी सूरजबली निवासी लोढ़वा की हालत गंभीर देखकर उन्हें जिला चिकित्सालय रेफर कर दिया गया है।
विज्ञापन

उल्टी-दस्त से शीलम (13) पुत्री रामसेवक की रविवार को मौत हो गई थी। उसे देखने आई उसकी बुआ श्याम कली निवासी लोढ़वा भी परिवार के साथ बीमारी की चपेट में आ गई और उनकी हालत गंभीर हो गई। मोहल्ले वासियों ने गांव में साफ-सफाई और मच्छर रोधी दवा का तत्काल छिड़काव कराने की मांग की है। इस बाबत डॉ अमिश कुमार ने बताया कि गांव में डॉ. अजय शुक्ला, डॉ. अभिषेक, अनुज प्रताप सिंह बीएचडब्लू शिव शंकर और अमित कुमार की टीम ने दवाएं बांटी हैं। स्थिति पर नजर रखी जा रही है। फिर भी इसे पूरी तरह काबू में करने के लिए दो से पांच दिन लगेंगे। लोगों को साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देना होगा। इसकी सूचना जिला संक्रामक नियन्त्रण कक्ष को भी भेज दी गई है।


इंसेफलाइटिस से मौत पर भी नहीं चेता विभाग

बभनान।
बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में हुई मासूमों की मौत ने सब को झकझोर दिया है। हर कोई मौत को लेकर सवाल कर रहा है। फिर भी तीन तीन मासूमों की इंसेफेलाइटिस से मौत के बाद स्वास्थ्य महकमा झांकने तक नहीं आया
पूर्वांचल में पिछले कई वर्षों से इंसेफेलाइटिस जैसी भयानक बीमारियों से कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। बावजूद उसके सरकार प्रभावित गांव में अभी तक कोई सुख-सुविधा नहीं उपलब्ध करा पाई। इसको लेकर आज भी लोग शासन प्रशासन से सवाल कर रहे हैं। गौर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अंतर्गत वर्ष 2017 में आठ गांव इंसेफेलाइटिस से प्रभावित हैं। इसमें रानीपुर बाबू, मझौआ दूधनाथ, बेलवरिया जंगल, पैकोलिया पाली, सूअर बरवा, बावरपारा, सोनवालिया चपेट में हैं।जबकि पैकोलिया पाली की यश पुत्र रमलू सिंह व सूअर बरवा की ज्योति पुत्री रामदुलारे एवं रानीपुर बाबू के दीपचंद्र की 11 दिन की बच्ची की बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर में मौत हो चुकी है। रानीपुर बाबू के दीपचंद्र ने बताया कि बच्ची का जन्म पीएचसी हलुआ में हुआ। बच्ची के पैर में कुछ नीलापन था। इसी को देखते हुए डॉक्टरों ने बीआरडी मेडिकल कॉलेज गोरखपुर के लिए रेफर कर दिया। जहां बच्ची इलाज के दौरान 11 दिन के बाद ऑक्सीजन की कमी से मौत हो गई। गांव में ने तो स्वास्थ्य टीम पहुंची न ही परिवार को कोई आर्थिक मदद मिली। इसी तरह वर्ष 2016 में रानीपुर बाबू, सोनवालिया, तरैनी, सिकटा, महुआ डाबर, दुबौला, मझौआ दूधनाथ, मिरवापुर, तेनुआ व 2015 में बभनगावा कला, गोभिया, बैरिहवा, मुड़िलवा, असनहरा, भौखरी, शिवा, बेलवरिया करवनिया, सुजिया गांव इंसेफेलाइटिस की चपेट में आया और कई लोगों की जानें भी र्गइं। शासन की ओर से दावा किया गया था कि गांवों में स्वच्छ जल के लिए पानी टंकी का निर्माण होगा और घरों के आसपास नाली बनाई जाएगी। इसके साथ ही सरकार की कुछ अन्य सुविधाएं भी मुहैया कराई जाएंगी। कुछ गांवों में पानी टंकी का निर्माण तो हुआ मगर उससे आज तक एक बूंद पानी नहीं निकला। सुजिया के प्रधान प्रतिनिधि अब्दुल कलाम ने बताया कि ठेकेदारों ने आनन-फानन कमीशनबाजी के चक्कर में छोटी टंकी का निर्माण तो कर दिया लेकिन उसे चलाने के लिए मोटर पंप टोटी नहीं लगाई गई। इससे वह बेकार साबित हो रहा है। गांव वालों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग कभी-कभार गांव में दवा का वितरण करा देता है लेकिन संक्रामक बीमारियों से लड़ने के लिए इनके पास कोई कारगर उपाय नहीं रहता है।
गौर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के स्वास्थ्य शिक्षा अधिकारी राम आसरे सरोज का कहना है कि इंसेफेलाइटिस जैसी बीमारियों को लेकर स्वास्थ्य विभाग हमेशा सतर्क रहता है और इसके लिए बभनान बीआरसी पर अध्यापकों के साथ बैठक कर उन्हें जागरूक भी किया गया। यही नहीं, ब्लॉक पर एएनएम, आशा, आंगनबाड़ी कार्यक र्ताओं, सफाई कर्मियों को बीमारियों के बारे में ट्रेनिंग दी गई और उन्हें अपने अपने गांव में जागरूकता लाने एवं साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने को कहा गया है। प्रभावित गांव में स्वास्थ्य टीम पहुंचकर रोगियों का स्लाइड भी बनाती है। उसे जांच के लिए बाहर भेजा जाता है।

जेई-एईएस के हाई रिस्क जोन में 23 गांव

बस्ती।
जापानी इंसेफेलाइटिस और एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम के लिए संवेदनशील माह में शासन ने जिले के 23 गांवों को हाई रिस्क जोन घोषित किया है। इन गांवों में पांच वर्ष में सर्वाधिक जेई व एईएस के मरीज पाए गए हैं। शासन के सर्वे में उच्च जोखिम के इन गांवों में दूषित जल के प्रयोग व गंदे पानी के निकास की पर्याप्त व्यवस्था न होने के कारण मच्छर पैदा हो जाते हैं। इसके संक्रमण के चलते रोग फैलने की अधिक आशंका होती है। शासन के प्रमुख सचिव प्रशांत द्विवेदी ने डीएम को चिह्नित गांवों में बैक्टीरियोलॉजिकल जांच व क्लोरीनेशन के निर्देेश दिए हैं। इसके अलावा गांवों में पर्यावरण स्वच्छता, जल निकासी की व्यवस्था को भी व्यवस्थित करने के निर्देश शासन ने जारी किए हैं।
जिले के जिन गांवों को संवेदनशील सूची में रखा गया है उनमें बहादुरपुर ब्लॉक के बबुरहिया, बनकटी ब्लॉक का महथा, जय विजय नगर, रामपुर रेवली, उमरी अहरा, गौर ब्लॉक के बभनगांवा कला, भौखरी, सदर क्षेत्र का खदरा, बनगवां, गनेशपुर, जिगिना, पचीसा, कुदरहा ब्लॉक का दैजी, रामनगर ब्लॉक का असनहरा, रुधौली ब्लॉक का रुधौली कला, सेहुड़ा कला, सुरवार कला, सल्टौआ ब्लॉक का औड़जंगल, पचमोहनी, शिवपुर, सांऊघाट ब्लॉक का भरवलिया, भतरिन्हवा व मुजहना गांव शामिल हैं। इन गांवों में पांच वर्षों से लगतार जेई और एईएस के मरीज पाए जा रहे हैं।

एसएनसीयू की टीसी बिल मशीन गायब

बस्ती।
जिला महिला चिकित्सालय में दवाओं में हेराफेरी के खेल के बीच एक नया मामला प्रकाश में आया है। यहां एसएनसीयू में स्थापित टीसी बिलिंग मशीन केवल कागज में है। क्योंकि धरातल पर इस मशीन का कहीं पता नहीं है। पिछले दिनों लखनऊ से आई एक दल ने तत्कालीन सीएमएस डॉ. गनेश यादव से इस मशीन के एसएनसीयू में स्थापित होने के बारे में बताया भी था, मगर बात आई और फिर चली गई।
विज्ञापन

महिला चिकित्सालय के सिक वार्न बेेबी केयर यूनिट में दवाओं की खरीद में हेराफेरी का मामला अभी नोडल अधिकारी ने खोला ही था कि इसी वार्ड में स्थापित साढ़े तीन लाख रुपये की मशीन का भी मामला सामने आया है। यह मशीन दुधमुंहे बच्चों के सीरम बिलरोबिन यानी पीलिया की जांच करता है। वह भी बिना खून निकाले। यह मशीन एनआरएम के तहत वर्ष 2016 से ही कागज में संचालित है, मगर धरातल पर इसका कहीं पता नहीं है। सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि इस मशीन को लेकर सीएमएस डॉ. गनेश यादव को कोई जानकारी भी नहीं है। सीएमएस डॉ. गनेश यादव कहते हैं कि नौ-दस दिन पूर्व लखनऊ से आई टीम के सदस्य ने टीसी बिलिंग मशीन के बारे में इतना कहा था कि इसे एसएनसीयू को उपलब्ध कराया जा चुका है, मगर मैंने इसका सत्यापन कराया तो यह अस्पताल में नहीं मिला। स्टोर में भी यह मशीन नहीं है। चूंकि इसे एनएचएम के माध्यम से यहां दिया जाना था। ऐसे में वह मशीन मेरे जानकारी के मुताबिक चिकित्सालय को दी ही नहीं गई है। इस बारे में उच्चाधिकारियों को बता दिया हूं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें