बस्ती। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी से शासन वाकिफ है। इस कमी को दूर करने में सरकार ऊर्जा लगा रही है, जिले में तैनाती पाने वाले डॉक्टर ज्वाइन नहीं करना चाहते। कारण संसाधन तो है ही डॉक्टरों के रहने की समुचित व्यवस्था भी नहीं है। जिला अस्पताल में रहने वाले डाक्टर जर्जर भवन में जोखिम लेकर रात बिताते हैं। हालांकि कई डाक्टर इसी में परिवार सहित रहते हैं, मगर उनके मन में भवन को लेकर डर बना रहता है।
जिला अस्पताल में लोक निर्माण विभाग ने डॉक्टरों के लिए करीब बीस भवनों के निर्माण कराए हैं। यह सभी भवन टाइप थ्री व टाइप फोर व फाइव के हैं। इनका आवंटन डीएम करते हैं। जिला अस्पताल में कार्यरत ज्यादातर डॉक्टर इन्हीं भवनों में निवास करते हैं। इसके बदले वे जहां वेतन के मुताबिक 35 सौ से लेकर छह हजार तक मिलने वाला किराया स्वास्थ्य विभाग उन्हें नहीं देता बल्कि उनके वेतन से करीब 13 सौ रुपये प्रतिमाह कटौती की जाती है। जिला अस्पताल में यूं तो नियमानुसार आठ घंटे की ड्यूटी होती है, मगर ऑन कॉल कभी भी उन्हें बुलाया जा सकता है। यानी ड्यूटी आठ घंटे के अलावा वे इमरजेंसी में भी काम करते हैं। ऐसे में डॉक्टरों को राहत मिले, इसके लिए उनके निवास अस्पताल में ही होते हैं, मगर जिला अस्पताल में जो आवास डॉक्टरों को आवंटित है, वह जर्जर हो चुका है। इस भवन में परिवार सहित रहने वाले डॉ. रामजी सोनी कहते हैं कि भवन तो जर्जर है, लेकिन क्या करें अस्पताल में रहना मजबूरी है। क्योंकि यदि दूर निवास होगा तो इमरजेंसी में काल पर समय से नहीं पहुंच सकेंगे। ऐसे में मरीज संकट में पड़ सकता है। कहते हैं कि भवन की छत इतनी जर्जर है कि बारिश के दिनों में छत पर प्लास्टिक की पन्नी लगाते हैं। यदि पानी टपकना बंद नहीं होता है तो मच्छरदानी पर भी पन्नी लगा लेते हैं। इसी भवन के दूसरे हिस्से में रहने वाले डॉ. रूपेश कुमार हलदार कहते हैं कि रात में आवास पर जाने में डर लगता है कि कहीं कोई सांप या बिच्छू न काट ले। भवन की स्थिति भी बेहद जर्जर है। सभी यहां परेशान हैं, मगर इसका कोई समाधान नहीं है। एसआईसी डॉ. ओपी सिंह ने कहा कि डॉक्टरों के निवास जर्जर हैं। यह संज्ञान में है। इसके लिए पीडब्ल्यूडी को लिखा जाएगा।