ताकि बिगड़े न पर्यावरण, सेहत रहे दुरुस्त
होली में ईको फ्रेंडली रंग, अबीर-गुलाल पर जोर
होलिका में औषधीय वनस्पतियां डालने की शुरुआत
रासायनिक रंगों का नफा-नुकसान भांप चुकी आवाम
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। नई पीढ़ी सेहत और पर्यावरण को लेकर कितनी सजग है, इसका नमूना अबकी बार होली के त्योहार पर देखने को मिल रहा है। बनावटी चमक-दमक और खुशबू वाले रासायनिक रंग व अबीर-गुलाल से तौबा करके होली में ईकोफ्रेंडली ट्रेड अपनाने में आगे आ रहे हैं। न केवल होली के लिए बल्कि होलिका दहन में भी पर्यावरण के मद्देनजर तुलसी, सतावर, आंवला, आम, गूलर, चिड़चिड़ा जैसी औषधीय महत्व की वनस्पतियों का इस्तेमाल करने पर नई पीढ़ी ज्यादा जोर दे रही हैं। युवाओं के इस बदले ट्रेंड को लेकर अमर उजाला ने कुछ युवाओं से बात की तो वे खुलकर बोले कि रासायनिक रंगों का नफा-नुकसान अब लोग भांप चुके हैं। इसलिए बिना किसी संकोच के ईकोफ्रेंडली ट्रेंड अपनाए बिना किसी का भला नहीं हो सकता।
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प्रगतिशील किसान राहुल पांडेय कहते हैं कि ईकोफ्रेंडली होली को लेकर रुचि बढ़ रही है। कारण दिन-ब-दिन जर्जर होते पर्यावरण और बेकाबू मौसम का मिजाज सुधारने के लिए होली-दिवाली मनाने के तरीके बदलने होंगे।
रसायनिक रंगों को होली खेलने के बाद शरीर से छुड़ाने में ज्यादा पानी खर्च हो जाता है, जबकि गुलाल से खेली होली में कम पानी एक व्यक्ति पर खर्च होता है। यह कहना है आठवीं में पढ़ने वाली काव्या पांडेय का।
शिक्षक अश्विनी पांडेय कहते हैं कि जहां तक संभव होगा होली पर चंदन, गुलाल और फूलों का उपयोग करेंगे। आशा करें कि इन्द्रधनुषी रंगों की भांति खुशियों के रंग बिखरे। रासायनिक रंग से त्वचा को क्षति पहुंचती है।
बैंक कर्मचारी राघवेंद्र का कहना है कि होली की मस्ती, उत्साह, उमंग तब और भी बढ़ जाता है, जब हम ऑर्गेनिक कलर्स का इस्तेमाल करते हैं। जो सस्ते में तैयार हो सकता है। इससे साइड इफेक्ट भी नहीं हैं।
ऐसे बनाएं ईकोफ्रेंडली रंग
जंगलों में पाये जाने वाले टेसू के फ़ूलों को उबालकर भी नारंगी व केसरिया, लाल रंग के लिए लाल गुलाब की पत्तियों को बारीक पीसकर लाल गुलाल बनाया जा सकता है। दो चम्मच हल्दी को चार चम्मच बेसन के साथ मिलाकर उसे पीला गुलाल के रूप में उपयोग किया जा सकता है। गेंदें के फूलों की पत्तियों को सुखाकर उसका पेस्ट अथवा गीला रंग बनाया जा सकता है। दो चम्मच हल्दी पाउडर को दो लीटर पानी में उबालने पर गाढ़ा पीला रंग बन जाएगा। दो लीटर पानी में 50 गेंदे के फूलों को उबालने पर अच्छा पीला रंग प्राप्त होगा। गुलमोहर, पालक, धनिया, पुदीना आदि की पत्तियों को सुखाकर और पीसकर हरे गुलाल के रूप में उपयोग किया जा सकता है। एक लीटर गरम पानी में चुकंदर क्रश करके रात भर भिगोकर रखें। यह बैंगनी रंग में परिवर्तित हो जाएगा।
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होली: अब वह बात कहां, रह गई औपचारिकता
फागुन लगते ही शुरू हो जाता था हास-परिहास
रंग बिरंगी होली पर अब न वह जोश न उमंग
अरुण/जाहिद
नगर बाजार। बुजुर्गों का मन अब भी फागुन लगते ही मचलने लगता है लेकिन बदलाव की बयार पर अफसोस जताते हैं। कहते हैं कि होली को दो दिन ही बचे हैं लेकिन किसी के चेहरे पर रौनक ही नहीं है। बाजार पर इसका असर साफ दिख रहा है। गांव व शहर की गलियों में न तो होली का कोई जोश दिख रहा न तो उमंग। आधुनिकता ने इस त्योहार की मूलभावना ही छीन ली है। ढोल की थाप पर जोगीरा और रंग गुलाल उड़ाने की परंपरा जीवन के संघर्षों में ठंडी पड़ गई है। होली का परंपरागत फगुआ भी शायद यादों में ही है। अब तेज आवाज वाले डीजे से रंग बरसे भीगे चुनर वाली ही रह गई है।
क्षेत्र के बुजुर्गों से उनके समय की होली पर मन टटोला गया तो बचपन की यादों में खो जाते हैं। कहते हैं कि गांव में हफ्ता भर पहले से ही होली शुरू हो जाती थी। बाहर कमाने वाले भी होली पर गांव आते थे। एकजुट होकर हर घर के दरवाजे पर जोगीरा गाते पहुंच कर होलिका मांगते थे, मगर यह परंपरा शायद अब किसी को याद नहीं। फगुुआ और जोगीरा सनातन संस्कृति के परिचायक थे, जिसे लोग धीरे-धीरे भूल गए हैं। एक-दूसरे पर रंग डालने की परंपरा तो जीवित है, मगर अब केवल औपचारिकता ही कही जाएगी। तब न तो कोई हिंदू था और न मुसलमान बस होली थी, रंग था और एक-दूसरे का संग था। सभी समुदाय के लोग एक दूसरे के त्योहार को ऐसे एकजुट होकर मनाते थे, जैसे उनके खुद के घर में त्योहार हो। कस्बे के 80 वर्षीय सीताराम कहते हैं कि पहले होली के 15 दिन के पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती थीं। उस समय घूरे गुप्ता के अगुवाई में लोग बड़ी संख्या में फगुआ और लोकगीत आदि गाकर हंसी, मजाक के साथ होली का त्योहार मनाते थे, अब तो यह सब सपना हो गया है।
82 वर्षीय धनपति देवी ने बताया कि पहले के समय मे होली खेलने का अपना एक अलग अंदाज था। होली के दिन गांव की महिला पुरुष एक दूसरे से हंसी मजाक के साथ होली खेलते थे। कीचड़ भी फेंक देते थे लेकिन अब लोग बुरा मानते हैं वह जमाना अब नहीं रहा।
जगदंबा पांडेय हैं तो 87 वर्ष के लेकिन होली मनाने के बारे में बचपन याद करने लगते। कहते हैं कि पहले होलिका जलाने के दूसरे दिन लोग ढोल मजीरा के साथ घर, घर जाते थे और रंग व कीचड़ फेंक कर होली खेलते थे। पहले हमारी अगुवाई में गांव के लड़के फगुआ, चौताल, डेढ़ताल आदि गाते थे। अब तो किसी को याद ही नहीं।
79 वर्षीय रामउजागिर पांडेय ने बताया कि ढोल मजीरे के साथ फगुआ गाया जाता था। होलिका दहन के दूसरे दिन उसके राख को लोगों के घरों पर उड़ाया जाता था। दोपहर में सब लोग स्नान करके ढोल मजीरा के साथ रंग गुलाल के साथ होली मनाते थे। अब जमाना बदल गया है। आज डीजे ही मनोरंजन का साधन है।