अब अपनी मंडी में बेच सकेंगे गेहूं-धान
मंडी एक्ट संशोधित, जारी करेंगे लाइसेंस
फार्मर्स प्रोड्यूसर्स आर्गेनाइजेशन को जिम्मा
गेहूं, धान के अलावा अन्य कृषि उपज संरक्षण कर सकेंगे किसान
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। निजी मंडी खोलने की योजना यदि मुकाम तक पहुंची तो अन्नदाता दाने-दाने को मोहताज होने से बच जाएगा। किसान अपनी जमीन पर मंडी स्थापित कर सकेगा। इसके लिए प्रदेश सरकार लाइसेंस देगी। क्रेता सीधे किसानों से उनकी उपज खरीद सकते हैं। यदि कोई किसान सीधे उपभोक्ताओं को कृषि उत्पाद बेचता है तो उसे मंडी शुल्क नहीं देना होगा। जल्द ही इसके लिए आवेदन आमंत्रित किए जाएंगे। राज्य सरकार अब निजी क्षेत्र में मंडियों की स्थापना को बढ़ावा देने के लिए फार्मर्स प्रोड्यूसर्स आर्गेनाइजेशन (एफपीओ) को किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए नामित किया गया है।
जिले की 1247 ग्राम पंचायतों में 90 फीसदी से ज्यादा गंवई पृष्ठभूमि से हैं। जिनका मुख्य पेशा कृषि है। नकदी फसल के रूप में गन्ने से मोहभंग होने के बाद ज्यादातर किसान धान और गेहूं की पारंपरिक खेती को आधुनिक ढंग से करके अच्छी उपज प्राप्त कर रहे हैं। लेकिन वाजिब दाम न मिलने से उसकी आर्थिक दशा बदतर होती जा रही है। बहादुरपुर ब्लॉक के प्रगतिशील किसान नरेंद्र बताते हैं कि समय परधान-गेहूं का वाजिब मूल्य नहीं मिल पाता। मजबूरी है कि एक तो उसे अगली फसल व घरेलू खर्च के लिए नकदी चाहिए होती है। वहीं संतराम यादव का कहना है कि सरकारी क्रय केंद्रों की दशा बदतर होते जाने से किसान सरकारी केंद्र के बजाए किसान बिचौलियों को अनाज बेचने को मजबूर हो जाता है। ऐसे में निजी क्षेत्र में मंडियों की स्थापना को बढ़ावा देने की स्कीम संजीवनी साबित हो सकती है।
डीएम डॅा. राजशेखर के अनुसार यूपी सरकार ने मंडी अधिनियम में बड़ा बदलाव करते हुए निजी क्षेत्रों की मंडियों की स्थापना का रास्ता साफ कर दिया है। मंडी अधिनियम में संशोधन के बाद निजी समूह मंडी खोलने के लिए आवेदन करेंगे उसके बाद उन्हें मंडी स्थापित करने का लाइसेंस दिया जाएगा। ऐसा करने से सरकारी और निजी मंडियों में प्रतिस्पर्धा की भावना आएगी और किसानों को लाभ मिलेगा।
ई-नाम दूर करेगा दिक्कत
खेती में आने वाली दिक्कतों के अलावा मार्केटिंग को और आसान बनाने के लिए ऑनलाइन मंडी में ई-नाम प्रणाली की शुरुआत की गई है। इससे अब व्यापारी एक लाइसेंस से उत्तर प्रदेश भर में कहीं भी व्यापार कर सकेंगे। अभी तक मंडियों से खरीददारी ही संभव थी। किसानों के दरवाजे तक बाजार पहुंचेगा। इससे छोटे किसान ढुलाई समेत अन्य फालतू खर्चों से बच सकेंगे।